हर्फ़ उल्फ़त के पढ़ लेना ध्यान से
लफ़्ज़ों की पोशाक पेन्ही हैं ऑंखें
अफ़साने दिल के सुना देते आँखों-आँखों
जुबां कंपकंपा गयी जो बात कहते-कहते,
बज़्म में बेसाख़्ता मिलीं जो हमारी निग़ाहें
कुछ तो बुदबुदा गईं पलकें झुकते-झुकते,
सूनी नाद हमने इक दूजे के धड़कनों की
जाने क्यूँ लड़खड़ा गए क़दम बढ़ते-बढ़ते,
मस्ती छाई सांसों में मुस्कराये है ज़िन्दगी
ऐसा मय पिला गईं दो आँखें चलते-चलते,
सजा रखी रात-दिन ख़्यालों की महफ़िल
दबे पांव आता है कोई रोज महके-महके,
नयन के फ़्रेम में मढ़ा कर तस्वीर तुम्हारी
लुत्फ़ खूब उठा रही हूँ ख़्वाब बुनते-बुनते,
उकेरुं रोज रेखाचित्र दिल के कैनवास पर
शैल सिंह
अल्फ़ाज़ भले ही रहते हों ख़ामोश
दिल की आवाज़ होती हैं ये आँखें ।
दिल की आवाज़ होती हैं ये आँखें ।
अफ़साने दिल के सुना देते आँखों-आँखों
जुबां कंपकंपा गयी जो बात कहते-कहते,
बज़्म में बेसाख़्ता मिलीं जो हमारी निग़ाहें
कुछ तो बुदबुदा गईं पलकें झुकते-झुकते,
सूनी नाद हमने इक दूजे के धड़कनों की
जाने क्यूँ लड़खड़ा गए क़दम बढ़ते-बढ़ते,
मस्ती छाई सांसों में मुस्कराये है ज़िन्दगी
ऐसा मय पिला गईं दो आँखें चलते-चलते,
सजा रखी रात-दिन ख़्यालों की महफ़िल
दबे पांव आता है कोई रोज महके-महके,
नयन के फ़्रेम में मढ़ा कर तस्वीर तुम्हारी
लुत्फ़ खूब उठा रही हूँ ख़्वाब बुनते-बुनते,
उकेरुं रोज रेखाचित्र दिल के कैनवास पर
क्या-क्या सोचूँ तूलिका से रंग भरते-भरते,
ज़माने का डर ना होता चाहत के दरमियाँ
खोल के किताब रखता दिल हँसते-हँसते ।
ज़माने का डर ना होता चाहत के दरमियाँ
खोल के किताब रखता दिल हँसते-हँसते ।
शैल सिंह
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