मंगलवार, 2 मई 2017

ग़ज़ल '' शमां खुद्दारियों की बुझने न देना ''

      ग़ज़ल 


यूँ तो मुक़द्दर से शिक़वा बहुत
ज़िन्दगी तूं हमेशा महकती रहे
तेरे बिंदास मिज़ाज पर जिंदगी
ग़मे मौसम इरादा बदलती रहे।

ठोकरों से मिली नसीहत बहुत
रख अधर आबोताब हँसती रहे
थक जाएँगी बुरी नीयतें जिन्दगी
ठोकरें खुद तबियत बदलती रहें।

हर लमहा रखना गुमां का जेहन
दर आने को रौशनी मचलती रहे
शमां खुद्दारियों की बुझने न देना 
खुद दस्ते-सितम हाथ मलती रहे |

दस्ते-सितम --सताने वाला हाथ

                             शैल सिंह 

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

गज़ल '' रख दिया जगत के सामने ''

      गज़ल 


ख़ामोशियों से धो दिया 
हसरतों के दाग को ,

सुर,साज़,गज़ल ढाल लिया
दर्द की हर आह को
सजल हुए जब नैन कभी
बदल दिया मिज़ाज को ,

मनहूसियत,चिंता,हताशा
औ घेरे हुए अज़ाब को
पिला ख़ुशी की घुट्टियाँ
रंगीन कर लिया अंदाज़ को ,

क्या-क्या न गुजरी ज़िंदगी में
ग्रहण लगे जब ख़्वाब को
कर लिया तम को हरने वास्ते
रौशन दिल-ए-आफ़ताब को ,

जब ग़म पहाड़ बन गए
हर वेदना की आग को
रख दिया जगत के सामने
खोल अंतर्द्वंद के किताब को ,

सत्कर्म,निष्ठा ईमान,श्रम की
सजा मिलती है क्यों बेदाग को
व्यर्थ संघर्ष होते,पस्त हौसले
मौन पीये अन्याय के तेज़ाब को ,

जो समझे खुद को तीसमारखाँ
कोई बता दे उस ज़नाब को
सामने रख के इक आईना
उतार लेगा फिर नक़ाब को ,

परख चल आएंगी खुद मन्ज़िलें
उठेंगे हज़ारों हाथ आदाब को
ना टूटो ना तुम बिखरो शैल
पंख लगेंगे नैनों में बसे ख़्वाब को |

                             शैल सिंह

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

'' हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में ''. एक मधुर गीत

एक मधुर गीत

हर शब स्याही चांद की भी रोशनाई में 


कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

तुम जबसे गये ये छोड़ नगर
मुझे वीरां-वीरां लगे शहर
हवा भी रूठ गयी गुलिस्तां से
अजनवी लगे हर गली डगर
फब़े ना ज़िस्म लिबास भरी तरूनाई में
अब वो आबोहवा रूवाब नहीं अरूनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

तुझे जबसे नज़र में क़ैद किया
कभी ख़्वाब ना देखा और कोई
तेरी याद में गुजरी शामों-सहर
दूजा शौक़ ना पाला और कोई
बोले ना चूडी़ खनखन सूनी कलाई में
पैंजनी भी रूनझुन ना झनकी अंगनाई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इस क़दर हुआ बदनाम इश्क़ 
हमें दर्द का तोहफ़ा मुफ़्त मिला
ख़्वाहिशों पर पहरे लगे दहर के
मौसम भी रंग बदला बहुत गिला
हर शब स्याही चाँद की भी रोशनाई में
जहर लगे कूक कोयल की भी अमराई में,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में,

इक दिन खिले थे हम गुंचों की तरह
किरनों की तरह बिखरा जलवा
तेरे शुष्क मिज़ाज से हैरां है दिल
इस दौरां क्या गुजरी तुम बेपरवाह
आनन्द नहीं महफ़िलों की रंगों रूबाई में
ना थिरकन में लोच कोई हो धुन शहनाई में ,

कैसे कटे दिन-रैन तेरी जुदाई में
नैना भरे बरसात झरें तन्हाई में ।
                                               शैल सिंह

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

'' शेर '' दिल के लफ़्ज शेरों में ढल गए

            दिल के लफ़्ज़ शेरों में ढल गए


                                 ( 1 )

मैंने तो खतों के चिंदे उड़ा दिए के किसी के हाथ ना लग जाएं
पर एक-एक हर्फ़ दिल के दराज़ में उन्होंने रखा है सहेज कर ,

अच्छा हुआ जो सपने चुरा लिए उसने वरना टूटकर बिखरते    
ख़ुशी देके हूँ फ़ुर्सत में वरना गुंचे ख़्वाब के सूखकर सिसकते ,

बात हमारी हमारे नहीं समझे,दिल के लफ़्ज शेरों में ढल गए
कमाल जो ख़त ना कर सके ग़ज़ल सरे महफ़िल में कह गए ,

कोई ऐसा दिन नहीं कि घटा ना बरसी अश्क़ में नहाये न रोज
हर शक़्ल में बिजली कड़की मासूम दिल को समझाए हैं रोज

मुद्दतों से उधर देखा नहीं आज देखा तो ठूँठ सा खड़ा है शाख़ 
कभी परिंदों का हरा-भरा संसार था इसपे कैसे खड़ा है उदास ।

                              ( 2 )

पास उन्हें देखकर ज्यों घटा छ गई
आँखों के रस्ते बरसात होने लगी धीरे-धीरे,

लंबे अरसों के बाद ये मुलाकात थी
लब ख़ामोश मगर बात होने लगी धीरे-धीरे ,

तसल्ली से भी जब जी ना भरा
अहसासे दिल अंगड़ाई लेने लगी धीरे-धीरे ,

पल में हरे हो गए लम्हे मुरझाये हुए
जज़्बात खुलकर मुखर होने लगी धीरे-धीरे। 

   

                                          शैल सिंह

'' ग़ज़ल '' हो गई देर झिझक की गली में अगर

 हो गई देर झिझक की गली में अगर


लब से बोलो न बोलो तुम कुछ मगर
हकीक़त वयां करतीं अंतर्मन की निग़ाहें तुम्हारी,

मौन की ये समाधि सच ना बोले भले
खोल देतीं राजे-उल्फ़त दिल की किताबें तुम्हारी,

लफ़्ज़ों की शक्ल में खिल जाते कँवल
क़शमक़श में खनकती मगर मुस्कुराहटें तुम्हारी,

धड़कते हुए दिल के अहसासात को
गुनगुनाती बेसाख़्ता दीवानगी सुन ग़ज़लें तुम्हारी,

बेतकल्लुफ़ जुबां पे लहरों को आने दो
ज़माने को दिखाओ हसीं नशेमन तमन्नाएँ तुम्हारी,

अनजान हम भी नहीं पता आशिकी का
क्यूँ रोकतीं इज़हार से संकोचों की सरहदें तुम्हारी,

कुछ तो बोलो भारी लगे लम्हा-लम्हा
क्यों पहेलियों में उलझा रखीं तुझे वर्जनाएं तुम्हारी,

चराग़ दिल का हम भी जलाये हैं बैठे
आसान होंगी भला कैसे आख़िर समस्याएं तुम्हारी,

हो गई देर झिझक की गली में अगर
कठपुतली बन नाचेंगी दिलकशीं आरजुवें तुम्हारी ।

                                                  शैल सिंह


शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

ग़ज़ल गुनहगार हूँ मगर बेकसूर भी हूँ

गुनहगार हूँ मगर बेकसूर भी हूँ


ज़माने की निग़ाहों का तीर सह सकी ना
मजबूर इस कदर हुई कर बैठी बेवफ़ाई

कभी आह भरती हूँ  कभी रोती बहुत हूँ
दर्द रात भर पिघलता  जाने कैसी बुत हूँ
अश्क़ गम के खातों में कसकती तन्हाई
मजबूर इस कदर हुई कर बैठी बेवफ़ाई

कभी फूल बन के तुम आते हो ख़्वाबों में
कभी पलकों पर आ  बह जाते सैलाबों में
क्यूँ गुजरे ज़माने की महका जाते पुरवाई
मजबूर इस कदर हुई  कर बैठी बेवफ़ाई ,

अपनी ज़िन्दगी अपनी किस्मत ना बस में
भला कैसे निभाते हम वफ़ादारी की रस्में
जिधर फेरती निग़ाह दिखती तेरी परछाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई ,

तिल-तिल कर मरती हूँ दिल की तड़प से
यह शमां जलती देखो ज़िस्म की दहक से
क़समें वादों का जनाज़ा क्या गाये रूबाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई

बेग़ैरत मोहब्बत ना मेरे हमदम समझना
ख़ुदा की कसम मुझको बेवफ़ा न कहना
बेपनाह मोहब्बत  की तुम्हें दे रही  दुहाई
मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई ,

तोहमत की बिजली न बेचारगी पे गिराना
जब भी दूँ सदा सुन फ़रिश्ता बनके आना
टूटा दिल का आबगीना फिर भरने रौनाई
मजबूर इस कदर  हुई कर  बैठी बेवफ़ाई

आबगीना --शीशा

                           शैल सिंह 

रविवार, 3 जुलाई 2016

एक दीवाना ऐसा भी

एक दीवाना ऐसा भी 

हटा दो लाज का पहरा 
   सबर आँखों का जाता है 
      मेरी बेचैन चाहत को 
         अदा नायाब भाता है ,

काली घटा सी जुल्फ़ें 
   क्या बिजली गिराती हो 
       मैं मदहोश हुआ जाता 
          ग़जब चिलमन गिराती हो ,

चुराकर चैन सोतीं तुम 
    सपन की मीठी बाँहों में 
       पल भर कटी ना रातें 
           मगन बोझल निग़ाहों में ,

अगर तुम ला नहीं सकतीं 
    जुबां पर दिल की वो बातें 
         निगाहों से वयां कर देतीं 
            जुबां और दिल की वो बातें ,

तेरे ख़न्जर नयन नशीले 
   कहीं जान ना मेरी ले लें 
       सुर्ख लबालब होंठ रसीले 
           मोहब्बत सरेआम ना पीलें ,

आँखें मदभरी मधुशाला 
   तिल क़ातिल गाल गुलाबी हैं 
       अकारथ ही हुआ मतवाला 
             रंग-ढंग भी चाल नवाबी है ,

पिलाकर मय निगाहों का 
   ना नजरें यूँ झुकाकर चल 
        दबाकर दिल की चाहत को 
            ना दिल को यूँ जलाकर चल ,

तुझे देखूं तो आता चैन 
    नहीं तो दिल को बेचैनी 
        क़यामत क्यूँ हो ढाती यूँ 
            बता दो ना वो मृगनयनी ,

रुसवाई का डर है गर 
    गर है ख़ौफ़ ज़माने का 
        तो बेख़ौफ़ ईनायत कर 
            कर परवाह दीवाने का ,

ख़ुदा की कसम ज़न्नत 
    तिरे क़दमों में बिछा दूंगा
         अगर तूं चाँद मांगे जानम 
             जमीं पर लाकर दिखा दूंगा ,

क़सीदा तुम ग़ज़ल की हो 
   सुर,लय ,ताल नग़मों की 
        इन्तेहा प्यार की गर चाहो 
            तो ले लो सात जन्मों की ,

कर दीदार जालिम खोल 
    झरोखा दिल के दरपन का 
        क्या हालात हैं रोज़ो-शब 
            दीवाने दिल की धड़कन का ,

कहते लोग परेशां मुझको 
    कहाँ एहसास खुद का मुझको 
       हाँ औरों से सुना है जानम 
            मेरे हालात मालूम तुझको ,

 गर तुम पास होते दिलवर 
     समां का लुत्फ़ लेते छककर 
         फ़िज़ां भींगी सुहाना मौसम 
            होता गर बाँहों में लेते भरकर ,

ख़त लिखना नहीं वाज़िब 
   दिलो-जां में हो तुम रहती 
      तुझे हर हर्फ़ मालूम ख़त के 
          नित सांसों में समायी रहती ,

गर पूछेगा सितमगर कोई 
    पगले तूं बर्बाद हुआ कैसे 
         तेरी नाजो-अदा ने मारा 
             कह दूंगा ख़ुदा क़सम से ,

                              शैल सिंह