बुधवार, 17 नवंबर 2021

कुछ शायरी

                     कुछ शायरी


जब ग़म मुश्किल हो जाए सीने में ज़ज़्ब करना
भींगो लेना अश्कों की कलम से पन्नों का सीना
ये सिसकियां भी इक दिन बन जाएंगी फसाना
ग़म जाहिर कर जमाने को कभी मौका ना देना,
दर्द हर्फ़ों के लिबास में जब्त पन्नों पर कर लेना
नींद की आगोश में करवटें बेफिक्र हो भर लेना । 


कभी ख़ुशग़वार हो बहारें गुजरती थीं बगल से
आज अहदे-खिजां दे गुजर गईं यूँ सर्र से बगल से
मासूम यादें खूब रोईं लिपट कर ख़्यालों की गुदड़ी से  
जैसे लड़खड़ा कर बिखर जाते मायूस हो पत्ते दरख़्त से
वैसे तो बहुत सारे दस्तावेज पास तन्हाई बहलाने के मग़र
यादें ज़ेहन के दीवारों दर खड़ीं खण्डहर सी माज़ी की मग़र। 


तेरी भेंट की हर चीज को जीने का संबल बना लिया है
रेशमी यादों का रेशा-रेशा,लपेट कर कंबल बना लिया है
आँखों में तेरी तस्वीर बसा ज़िन्दगी को संदल बना लिया है
तेरे ख़्यालों में सुलगते रहना ज़िन्दगी को जंगल बना लिया है
जख़्म,वफ़ा,बेवफ़ाई शुमार कर जीस्त को दंगल बना लिया है
गुजरे लम्हों की परछाईयाँ,लिखे ख़तों को भूमंडल बना लिया है। 

मेरे शब्दों को ग़ज़लों की,इबारत भर मत समझ लेना 
मेरे रूह की भींगी अल्फ़ाज़ों,की झनकार हैं ये ग़ज़लें 
ज़िन्दगी जिन हर्फ़ों के सुर,सप्तक लब पे न सजा पाई 
उसे पन्नों पे लिखे ताकि रूह को झकझोर दें ये ग़ज़लें।

कितना करूँ ऐतबार ये इन्तज़ारी मार डालेगी
दिल का छीन गया क़रार बेक़रारी मार डालेगी
नज़र से नज़र मिली बस ज़रा सी क्या सफर मेें
के इश्क़ में हुए ये कारोबार बेज़ारी मार डालेगी ।

बड़ी ताब लेकर निकलता है सूरज
गोधूलि में मायूस होकर मग़र डूबता है
गुमां क़ामयाबी का अच्छा नहीं होता दोस्त
शीशे के मानिंद गरूर इक दिन मग़र टूटता है ,
                                           

लोगों के लहज़े,अंदाज़ बता दिया करते हैं दिल में छुपे राज
चाहे जितनी मशक्क़त करले चेहरा,जुबाँ भाव छुपा लेने की।
               

ऐसी आड़ी तिरछी मुश्किलातें जिंदगी में,मेहनत रंग नहीं लाती
भगवन इतनी अच्छी नींद दे देना कि सपने देख मगन तो हो लूँ ।
                              
ईश्वर ने मुकद्दर तो बहुत उम्दा,अच्छा लिखा था 
मग़र बदइंसानों ने कीं हर बार साथ नाइंसाफियाँ ।
                                    
हम इतने बेख़याल हो गए कि गर्द चढ़ गई रिश्तों पर
जब पुराने रौ में लौटी तो लोग पहचानने से मुकर गए।

पंख उड़ानों को लगाती भी तो भला कैसे
हौसले औरों के आधीन औ पाबन्द जो थे। 


बसाया था जिन आँखों में मुझे आँखों की पुतली बनाकर
उन्ही आँखों में किसी ने डाल लिया है डेरा बसेरा बनाकर ,

धैर्य का दामन थामे मुश्क़िलाते आसां कीजिये
ज़िन्दगी है एक इम्तिहान,इम्तिहान देते जाईये ,

ऐ चाँद उतर आना चुपके से   
इक रात मेरे भी दरीचे में 
ख़ाहिशों के जुगनू जगमगा कर
छुप जाना बादल के कूचे में ,
                                        
कुछ अहसासों के ख़ुश्बू पास कुछ यादों के जुग़नू पास 
कुछ बचपन के गुजरे लम्हों की ,भूली बिसरी यादें साथ 
जीवन के इस विस्तार में बस,कुछ यादों का है बसा संसार
जब-जब पूरवा बहे अतीत की तब-तब यादों की पड़े फुहार 
पलकों का आँगन नम कर जातीं कितने शक़्लों की परछाई
विचरित करने लगतीं जेहन में,जब बाँहों में भर-भर तन्हाई ।   



गजल -- हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में

हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में 

दुधिया  आँचल  फैलाए  जवां रात है
रेशमी स्मृतियों की निर्झर बरसात है
खोल घूंघट घटा की चाँदनी चुलबुली
सजाई टिमटिम सितारों की बारात है ।

ख़ाब रूपहला सजाए  हुए पलकें मूंद
सपनों की आकाशगंगा में तिरती रही
गदराई चाँदनी छिटक कर अंगना मेरे
मृदुल स्पन्दन सुप्त प्राणों में भरती रही ।

मद्धिम हो जायेगी चाँदनी की उजास
आलम ये खो जायेगा भोर की गर्द में
रंग बिखर जायेगा हुस्न और ईश्क़ का
कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में ।

तेरे सहन में भी हो ऐसी दिलकश रात
मची हलचल  ख़यालों की  बस्ती में हो
हर लमहा गुजारा जैसे तेरे इन्तज़ार में
तेरी भी यामा  जग आँखों में कटती हो  ।

लफ्ज़ गूंगा तराशूं किन उपकरणों से
कि बयां कर सकें बेचैनियां ऐ बेवफ़ा 
बड़े ही तहज़ीब से यादें पहलू में बैठ
दर्द देतीं ज़ख़्म-ए-ज़िगर को बेइंतहा ।

उर में कोलाहल सन्नाटा फैली फ़िज़ा
खुशी कुहराम मचा बैठी हड़ताल पर
बेसबब इन्तज़ार का शामियाना लगा
रचातीं अश्रुओं से हैं स्वयंवर रात भर ।

आखिर कबतक नज़रबंद दिल में रहें
रतनारी आँखों में घटा बनी घिरतीं रहें।
छुपाये रखा जिसे दश्त की निग़ाहों से
शोर बरपा गयीं उमड़ बरसी आँखों से ।

सर्वाधिकार सुरक्षित
                   शैल सिंह

शनिवार, 23 नवंबर 2019

ग़ज़ल '' मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब ''

      मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब


वो मेरे दिल की धड़कन हैं
मैं उनके दिलो जां की धड़कन हूँ
अगर आँखों में नहीं आतीं मेरे चैन की नींदें
तो उनके भी ख़्यालों की मैं मीठी-मीठी तड़पन हूँ। 

वो मेरे हर जिक़्रों में हरदम
मैं उनके हर जज़्बातों में हरदम
क़रन वो भोर के मैं उनकी शाम शीतल सी
मैं उनकी दीवानगी में तो वो मेरे ख़्वाबों में हरदम।

जब से दीदार हुआ उनका
हर वक्त ऑंखें बेक़रार रहती हैं
यकीं इतना मुझे ऐसे ही वो भी बेज़ार रहते हैं 
वो मेरे लिए हैं खास मेरी भी उन्हें परवाह रहती है।

दिल की बेबसी का आलम
दिल समझता नैन हैरान रहते हैं
अहसासों को समझने को बिछड़ना जरुरी है  
मिठास दर्दों में भी होती भले हम परेशान रहते हैं।

मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब
ग़र ख़ुदा किस्मत से ख़फा न हो 
ज़रा सी ज़िन्दगी में बेहिसाब मेला मुरादों का
हसीं हर क्षण ख़ियाबां सा ग़र मुहब्बत जुदा न हो।

क़रन--किरण , ख़ियाबां--पुष्पवाटिका
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह 

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

'' पी आँसुओं का सैलाब समन्दर हूँ बन गई ''


क्यों आते हो मेरे ख़्यालों में तुम बार-बार 
दिल के साज़ों का छेड़ जाते हो तार-तार
मेरी वीरानियाँ भी महकतीं सदा फूल सी
क्यों तन्हाईयों से करते यादों का व्यापार ,

रोज दर्द दहकता हुआ  छोड़ कर सीने में
अक़्सर आजमाते हो टूट बिखर जाने को
हो गई दिल्लगी दिल के किस सौदाग़र से
कि चाहतें हुईं मज़बूर तुम्हें भूल जाने को ,

किस कुसूर की सजा में थी बेवफाई तेरी
वफ़ा की दरिया पहल की तूफां लाने की
क्या कसर बाकी रह गयी थी मेरे प्यार में
असाध्य मर्ज़ मिली तुमसे दिल लगाने की ,

तेरे ही दिए दर्दों की कैफ़ियत है ये ग़ज़ल
रियाज़ रोज करूं दर्द छिपा गुनगुनाने की
किन कण्ठों से गुनगुनाऊं जज़्बात सुरों में
भींगा लफ़्ज़ भी उदास आज शायराने की ,

न नफ़रत मुक़म्मल न मिटा पाना याद ही   
करके तेरे बग़ैर जीने की नाकाम कोशिशें
पी आँसुओं का सैलाब समन्दर हूँ बन गई
बेलग़ाम कश्ती में खे रही तमाम ख़्वाहिशें ,

बात करना ना आया तुझसे तेरे अंदाज में
रहता टूटे सपनों के सच होने का इन्तजार 
जो आँखें नज़रअंदाज़ की हैं आज बेतरह   
वही नज़रें कभी ढूँढ़ेंगी मुझे हो के बेक़रार ,

आँखों से उमड़े  दर्द शोर करें ख़ामोशियाँ
सबने जलसों में देखा मुझे बस हँसते हुए
छुप के रोता दिल नैनों में तड़प दीदार की
देखा न किसी ने भी तन्हाई में तड़पते हुए , 

कैफियत--विवरण,हाल

सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह

सोमवार, 23 सितंबर 2019

गजल '' सिला मजबूरी का दे लिपट गर रो लेते ''

सिला मजबूरी का दे लिपट गर रो लेते


शब्द कम पड़ गये छितरे-छतनारे भी
हाले-दिल,दर्दे-ग़म सुनाते-सुनाते उन्हें
दरअसल उन्हें सुनने में हमदर्दी न थी
हमने भी गुज़ारिश की कोशिश न की ।

देखे अंदाज़ बेपरवाह सा उठने का था
मुअत्तर आँखें न देखा पलट इक दफ़ा 
यतीम से ढले क़ीमती अश्क़ आँखों के   
हमने भी  नुमाईश की  कोशिश न की

झांक अतराफ़ में लेते तो रूख़्सत होते
सिला मजबूरी का दे लिपट ग़र रो लेते
बदलते रूत जैसे देखा उनकी चाल थी
हमने भी सिफारिश की कोशिश न की ।

क्या-क्या नुस्खे आज़मा सजी उन लिए 
ना देखा कुछ कहा दफ़अतन चल दिए  
कुछ अना की  दीवारें मन्ज़िलें भी जुदा
हमने भी आज़माइश की कोशिश न की ।

अन्त समय में मिला आखिर तो दर्द ही
सोचा कसमें,वादे,तसव्वुर याद दिला दूं
बेमसरफ़ सफ़र रहा मुहब्बत बेअर्थ भी  
हमने भी रंच ख़ाहिश की कोशिश न की ।

छतनारे—-विस्तृत , मुअत्तर—भींगा हुआ, 
अतराफ़—अन्तर्मन ,  दफ़अतन—यकायक
 

      सर्वाधिकार सुरक्षित
                         शैल सिंह

रविवार, 8 सितंबर 2019

थोड़ा हास-परिहास,,व्यंग्य

थोड़ा हास-परिहास,व्यंग्य 

धक्का-मुक्की मची साहित्यिक संगम पर
कवियों की बढ़ती अनहद भींड़ में
जबरदस्त होड़ लगी ऐसी कि इस
दमघोंटू अनियंत्रित भगदड़ में
स्वयं का खोया अस्तित्व ढूंढ ढूंढ
थककर हम न जाने कहाँ खो गए ।

प्रयास के सार्वजनिक सपाट मंच पर
निरन्तर ले दनादन कविताओं की
हो रही मूसलाधार दिन-रात बिन थमे
ऐसी बेहिसाब छपा-छप बरसात कि
इस धुंवाधार अल्हड़ बरसात में
भींगकर हम न जाने कहाँ खो गए ।

शब्द भंडारण के हर्फ़ चूक गए मेरे लिए
शब्दों के नक्काशीदार आभूषणों से 
अड़िच कर नाक तक उदर भर रहीं 
धकाधक गणमान्यों की रचनायें अब,
शब्दों का इस कदर नोंच-चोथ देख
रिक्त कोष में हम न जाने कहाँ खो गए ।

सूखी अन्तराभिव्यक्ति शब्दाभाव में
लेखनी अरूचि दर्शाती इस ठौर से
सबकी भाव नदी में जैसे बाढ़ आ गई
छक के ठूंस-ठूंस भरे शब्दों के कौर से
लगा कवियों का विस्तृत महाकुंभ मेला
भटक घाट पर हम न जाने कहाँ खो गए ।

सोचती किस विधा का रचूं काव्य मैं
अब तो कड़ियां भी मुझसे बेगानी हुईं
शब्दों का खजाना कंजूस मेरे लिए
सहर्ष न्योछावर हो सब पर नूरानी हुईं
इस अपाच्य मर्ज का उपचार ढूंढते
प्रिय सुधिजन हम न जाने कहाँ खो गए ।

पंक्तियां भी ठूंठ हुईं मुझसे रूठकर  
मेरी कल्पनाओं में फिर जाने कब
आयेंगी बहाररें फूटेंगी नई कोंपलें
मन प्रांगण होगा सुवासित जाने कब
हर्फ़ों की बसंती लहकती महक से
मधु सपनों में हम न जाने कहाँ खो गए ।

मन के विरान उद्यान में शब्दों की
जाने कब लगेगी झड़ी बौर सी
कूंककर सुप्त मेरी कलम कोकिला
जाने कब फूंकेगी नई उर्जा सौर सी
आस की क्षीण सी थरथराती रोशनी में
तल्लीन हो हम न जाने कहाँ खो गए ।

रचनाओं के परिमार्जन में ही मैं
वक्त जाया करूं या प्रयास के सीने पर
बाट लगा दूं बेरोकटोक रचनाओं की
उघाड़ शब्दों को या पछाड़ अर्थों को
कील ठोंक दूं अटपट कविताओं की
उहापोह में हम न जाने कहाँ खो गए ।

भावार्थ ढूंढूं या रहूं भाव शून्य
आलोचना करूं या समालोचना
आंकलन करूं या विश्लेषण करूं
कि तारीफों के पुल बांधते ठगते रहना
या खोलूं मिथक के सब्र की बेड़ियां
असमंजस में हम न जाने कहाँ खो गए ।

रस,छन्द,अलंकार से विभूषित करूं
या उजाड़ दूं सिरे से इसके मूल गंध ही
कहीं झर ना जाए लता कविता की
प्रयोगवाद से न मर जायें गीत,बन्द ही
कुश्ती लड़ूं या बदलूं अंदाज शौक का 
इस जमघट में हम न जाने कहाँ खो गए ।
                  शैल सिंह

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

" बिठा सपनों के हिंडोले पर चले जाते हो "

 बिठा सपनों के हिंडोले पर चले जाते हो

आँखें कहती हों कुछ देखते जिस तरह
छोड़ कर अबूझ कौतुहल चले जाते हो
जिज्ञासाओं के चमन खिला प्रेम पंखुरी
दीप मन के बसेरे में जला चले जाते हो ।

हृदय में भी उतर जरा झाँक जाया करो
लगाकर हसरतों का मेला चले जाते हो
कल्पनायें नासमझ उड़तीं बिन पंखों के
रिझा रास अलौकिक रचा चले जाते हो ।

क्यों कनखियों से देखते जताते बेरूखी
भरम का पिला गरल नशा चले जाते हो
क्यों भोर की किरण सांध्य बन चाँद का
छीन करार कुछ कहे बिना चले जाते हो ।

रूप निरखते सदा मन की टोह लेते नहीं
बिठा सपनों के हिंडोले पर चले जाते हो
मदोन्मत्त हो किये कुछ लिहाज भी करो
निर्दोष हसरतें संजीदा कर चले जाते हो ।

अल्फाज़ बोलो कुछ ताले खोल अधर के
झिझक की गली में सैर कर चले जाते हो
उल्लास के बहाव में बहा कश्ती मौन की
स्थिर मौजों को छेड़ दगा दे चले जाते हो ।

छोड़ो बुज़दिली मधुर शब्द घोलो कर्ण में
भाव मन के भाँप आघात दे चले जाते हो
ग़र अनमोल अवसर गंवा दिये संकोचों में 
बिखर जायेगा ये ताना-बाना चले जाते हो ।

सर्वाधिकार सुरक्षित
                      शैल सिंह