'' ओ पत्थर के दिल वालों,अब देखना मौज-ए-रवानी मेरी ''
वीरां-वीरां हुआ गुलशन,फूलों ने भी महकना छोड़ दियाजब मन से नहीं अनुबन्ध,रूह ने भी भटकना छोड़ दिया
औरों ने ठिकाना बना लिया,जब सुना सनम की बस्ती में
घटायें तो घिरीं सावन सी, आँखों ने बरसना छोड़ दिया ।
वक़्त के हाथों जख़्मों पर,ख़ुद वक़्त ने मरहम लगा लिया
इक वक़्त था जलते थे,शमां यादों का जलाना छोड़ दिया
क्यों ज़ख्म जहाँ को दिखलाऊँ,कर दी दर्द दफ़न सीने में
देख नासूरों को तिल-तिल,घुट-घुट मर जाना छोड़ दिया ।
मैं नहीं वो परवाना फतिंगा,जल ख़ाक़ में ज़िस्म मिला दूँ
दे दे सदाएं बस्ती-बस्ती,मेरी वफ़ा का लाश लिए फिरना
ये दरों-दीवारें दहलीजें,खुला दरीचा रखवाना छोड़ दिया ।
जिस शज़र के हर शाखाओं पर,आजाद परिंदा रहता था
उस शाख़ की कोमल कलियों ने,भी इठलाना छोड़ दिया
चिताएं सजा कर चाहतों की,दरिया में राख बहा डाली मैं
क्यूँ देखूँ अदा काँटों की,दिल फूलों से लगाना छोड़ दिया ।
गुंथे जिनके जिक्रों के मनके,मैंने बंद,शेर,ग़ज़ल रुबाई में
जो क़त्ल किया दिल का,उसे क़ातिल बताना छोड़ दिया ।
मुझ पर तो तजरबे बहुत किए वो,मैंने भी तजरबा सीखा
कैसे कहूँ उसे शिद्दत से कभी,हर लम्स शदीद से चाही मैं
गिर-गिर के संभलना आ तो गया,पर घायल होने के बाद
हुस्न ज़ाम नहीं मैख़ाने का,सागर सा छलकाना छोड़ दिया
ख़ता दोहराने की ताब नहीं,जाने कैसे ख़ता इक बार हुयी
फिर दिल का जनाज़ा निकले,देना वो नजराना छोड़ दिया ।
कभी काज़ल के करिश्मों सा,चमका था चाँद सा नज़रों में
कभी ज़िक्र ज़ुबां ना लाऊँगी,मैंने कसम से सौगन्ध खाई है
हर चिन्ह खुरचके फ़ेंक दिया,जीने का ख़ज़ाना खोज लिया ।
मैंने ख़ुद ही शहर में ख़ुद की पहचान बनाना सीख लिया ।
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शैल सिंह