मैं शायरकर नहीं पर शायरी किसी की विेरासत नहीं ,मैं ग़ज़लकार नहीं पर ऐसा नहीं कि उर्दू के हर्फ़ मेरे धड़कनों में धड़कतते नहीं। मेरे लेखनी की ख़ुश्बू हर दिल अजीज को भाएगी । उर्दू की तहजीब और उर्दू की अदब हमेशा से ही रिझाती रही हैं हिंदी की तरह । मेरे धडकनो और अहसासों का बेहतरीन गुच्छा जो लाजवाब और नायाब है ,मेरी काव्य विधा का शायरी और ग़ज़ल भी एक अंग है ,शायद इसके बिना लेखनी ,लेखक ,कवि की पूर्णता नहीं मेरी लेखनी के एक और रूप की वानगी ....|
शुक्रवार, 14 जनवरी 2022
फिर भी मन का प्यासा प्याला रीता
सोमवार, 20 दिसंबर 2021
एक दीवाना ऐसा भी
'' एक दीवाना ऐसा भी ''
ख़ूब सुन्दर सी आवाज भी तुम ।
तकदीर बनाने निकला घर से
हाय चंद्रमुखी का हुआ शिकार
झट नीलाम भावना कर बैठा
भरमा गई मन चितवन की धार,
सच्च अद्भुत ख़ुदा की नेमत हो
नामुरादों की नज़र से डरता हूँ ।
तुम बेमिसाल कली गुलशन की
मैं मदमस्त भंवरा अलबेला तेरा
कहो तो शाद से बहार बन तेरा ,
लगे जन्नत शबाब तेरा जानम
लगे तूं ताजी गुलाब बगिया की
आठों पहर माहताब दुनिया की ।
तेरी झील सी उन्मत्त आँखों में
डूबूँ उतराऊँ जिया मचलता है
मैं ठहरा इक बदनाम अनाड़ी
शाहकार आँखों का दोष है या
तूं है कोई देवलोक की अप्सरा
इन उपमानों के आगे यही लगे
दुनिया की थिसारस भी जरा ।
सारी उम्र गंवा दी मैंने जुनून में
आँखों के रस्ते दिल में उत्तर
क्यों रूह में हल-चल भर दी
अपनी बेबाक़ अदा से घायल
जां-ज़िगर को पागल कर दी ।
तेरे घुँघराले ज़ुल्फ़ों के पेंचों में
मैं ऐसा उलझा उबर नहीं पाया
तेरा कोई और है क्या परवाना
जिन केशों की घनेरी छाँव तले
मेरा दिन रात का सुखद बसेरा
निगल ना ले फ़ैशन की आँधी
कहीं उजड़ ना जाये ये घर मेरा ।
पूरब-पच्छिम दिन-रात भी मैं
निग़ाहों से शरारत तुमने किया
बिखरी ज़ुल्फ़ें फिरूँ बावरा सा
तूं तो रूप की ऐसी मधुशाला
अल्हड़ सी ग्रीवा झुकाती जब
तुझे हिक भरकर नज़र निहारे
कभी मेरी ओर पलट देखो जो
दिख जाते दिन में भी तारे-तारे ।
तुम्हारी क़ातिल अदायें शातिर
मैं था बेक़सूर यूँ ही मारा गया
पीता न कभी था शिकवा यही
निग़ाहों से क़सम पिलाया गया ,
पूरन के चाँद सी दिखतीं तुम
दिल में ज्वार ऊफन आता है
जब-जब चकोर बन निरखूँ मैं
चाँद ये बदली में छुप जाता है ।
मेरी रात सितारों से भर दो
फिर कभी बात बने कि नहीं
जरा गौर से देख लूं ठहरो तो
फिर मुलाक़ात ये हो कि नहीं ,
मंजिल दोनों की अलग-थलग
राहें भी सफ़र की ज़ुदा-ज़ुदा
फिर मिलें कभी या नहीं मिलें
ये तो जाने बस तेरा मेरा ख़ुदा ।
अहसासों को आम किया ना
निग़ाहों की जुबां से पढ़ लेतीं
मैखा़ने सा सुरूर था आँखों में
साक़ी बन मस्ती सांसों में भरी
जाना जब था फिर आई क्यों
यूँ बज़्म से उठ झट चली गईं
तराना कोई सुना दिया होता ,
अपमान भूला नहीं पाता हूँ मैं
रहती हर पल याद की ज़द में
पर तुझसा नूर नहीं पाता हूँ मैं ।
चिलमन से उठाकर परदा तुम
पत्थर की मोम सी प्रतिमा बन
आहें भरूं या पीऊँ मय छककर
बेपनाह मोहब्बत है ज़िन्दगी से
वीरां-वीरां दिल की हवेली मेरी
ख़ुद को भूला हूँ तेरे ख़्यालों में
मजबूर हूँ पर अब बेआस नहीं
नग़मों में पिरो-पिरो गा लेता हूँ
कैसे ज़खम भला मैं दिखलाता
दिल के तख़्त तुम्हें बिठाता मैं
जिस्म यह काश तुम्हारा होता
गुनगुनाता बेच ख़ुशी हाथों तेरे
सुकून से हर रात गुजारा होता ,
इस ईश्क़ में पागल मैं ही नहीं
घायल तूं भी मुझसे कम नहीं
यहाँ दर्दे ज़िगर बेहद तो क्या
नित्य अश्क़ों का ज़ाम हूँ पीता
लब सी दिल जार-जार है रोता
सनम हरजाई हँसी उड़ातीं तब
दुनिया जी बहलाती थी मुझसे
मुझपे ही सोजे-क़हर ग़म बरपा
अनजाने में हिमाक़त कर बैठा
देखो दिल चाक्-चाक् है दरका ।
महफ़िल का तेरे ऐ जाने-ज़िगर
कितना अद्भूत दस्तूर निराला है
कि इक बूँद को तरसे मतवाला
यहाँ मय का छलकता प्याला है ,
मैं तेरी ही खातिर देवदास बना
तूं भी पारो मेरी ग़र बन जातीं
कसम तुम्हारी सोना बन जातीं ।
मैंने तुझे रिझाने की ख़ातिर ही
कैसा ख़ुद पर अत्याचार किया
मन मुरादों की अधीर बेचैनी में
तूं ही तूं आए हर तरफ नज़र
जिस तरफ निराश नज़र जाए
मनमौजी मूरख नज़र ठगी सी
इश्तिहारों पे भी जा ठहर जाए ।
जैसे सर्प नेह से संदल दरख़्त
इस मृगतृष्णा से पहले सनम
मेरी अहदे-वफ़ा लम्हातें हसीं
क्या थीं तुझको एहसास नहीं
तेरे दर से गुजरा बस राहे जुनूँ
कितनी तहरीरें वफ़ा की मैंने
लिख कर तामीर बना डालीं
देकर दिल के मुंडेरों पे सदा
जलवा बिखेरतीं शबे-फ़िराक़
क़ातिलाना शरारतें कर जातीं
डूबो-डूबो सपनों के सागर में
तन्हा रातों में सपने भर जातीं ,
बेदस्तक़ आती मेरे ख़यालों में
प्रतिदिन महका जाती हो सांसें
अरमां मचल-मचल मुस्काता है।
तेरी स्मृतियों के दीप जलाकर
शबे-हिज्रां उन्माद में बहता हूँ
साथ ऐश्वर्य माज़ी का इतना है
रेज़े ज़ख्मों के सहेजा करता हूँ ,
यादों का साथ कारवाँ होता है
उजड़े चमन में कहाँ अकेला मैं
संग ग़म-गुसार बाग़वां होता है ।
पुतली बन आँखों में रहती हो
तक़दीर भले किसी और की तूं
हो किसी और के मठ की मूरत
शुक्र है कि मुझ आशिक के भी
इस दर्द में भी मिठास है इतना
रख अंबार ज़ख्मों का शानों पे
उदास ज़िन्दगी ठिठक जाती है
हो गया दीवाना या पागल मैं
सपना बन इतराती आँखों में
क्या सबब है मेरी तबाही का
जरा दुनिया को बतलाओ ना ,
नित सपनों के समन्दर में बहता
बेलगाम मौज़ों का मजा हूँ लेता
तह भीतर छुपकर बैठा रहता हूँ
कश्ती तट पे निडर सजा हूँ देता ।
घर-घर छाई जग-मग दीवाली
घर में ही दीप जलाना भूल गया
क्यूँ कि दिल का चराग़ है रौशन
ख़ुद को भी तो हूँ जैसे भूल गया ,
फिरता हूँ दीवानों सा गली-गली
जहाँ कहता मुझे लफ़ंगा लोफ़र
नख-शिख तक डूबा तेरे कर्ज़े में
मैं तो ठहरा सच्चा प्रेम पुजारी
सूख गई होगी सनम छुहारे सा
मेरे ज़ज्बों का शज़र हरा-भरा
दर्द पिघल शबनम की बूँद बना
भींगे काठ सा सुलगूँ तिल-तिल
फिरता रहता बस जंगल-जंगल
सर्द रातें संग यादों की महफ़िल ,
किस जगह कहाँ कब तुझे नहीं
तलाशती रहतीं हैं बेज़ार निग़ाहें
क्या ख़बर इन्हें कि तुम्हारी अब
कितना रूतबा है मुझ दीवाने का
किसी परिचय का मोहताज नहीं
अमीरी का सनद कृपा तुम्हारी है
यदि महाप्रलय आया डर लगता
और लील ना जाए सारी दुनिया
लेश परवाह ना ख़ुद की मुझको
मेरे दिल में दफ़न तुम्हारी तस्वीरें
रहता शाद अत्यंत इन जंजालों में ,
मिल्क़ियत तुम्हीं हो दिल की मेरे
रचना की कालजयी कविता मेरी
शैल सिंह
गुरुवार, 16 दिसंबर 2021
" ओ पत्थर के दिल वालों,अब देखना मेरी मौज-ए-रवानी "
'' ओ पत्थर के दिल वालों,अब देखना मौज-ए-रवानी मेरी ''
वीरां-वीरां हुआ गुलशन,फूलों ने भी महकना छोड़ दियाजब मन से नहीं अनुबन्ध,रूह ने भी भटकना छोड़ दिया
औरों ने ठिकाना बना लिया,जब सुना सनम की बस्ती में
घटायें तो घिरीं सावन सी, आँखों ने बरसना छोड़ दिया ।
वक़्त के हाथों जख़्मों पर,ख़ुद वक़्त ने मरहम लगा लिया
इक वक़्त था जलते थे,शमां यादों का जलाना छोड़ दिया
क्यों ज़ख्म जहाँ को दिखलाऊँ,कर दी दर्द दफ़न सीने में
देख नासूरों को तिल-तिल,घुट-घुट मर जाना छोड़ दिया ।
मैं नहीं वो परवाना फतिंगा,जल ख़ाक़ में ज़िस्म मिला दूँ
दे दे सदाएं बस्ती-बस्ती,मेरी वफ़ा का लाश लिए फिरना
ये दरों-दीवारें दहलीजें,खुला दरीचा रखवाना छोड़ दिया ।
जिस शज़र के हर शाखाओं पर,आजाद परिंदा रहता था
उस शाख़ की कोमल कलियों ने,भी इठलाना छोड़ दिया
चिताएं सजा कर चाहतों की,दरिया में राख बहा डाली मैं
क्यूँ देखूँ अदा काँटों की,दिल फूलों से लगाना छोड़ दिया ।
गुंथे जिनके जिक्रों के मनके,मैंने बंद,शेर,ग़ज़ल रुबाई में
जो क़त्ल किया दिल का,उसे क़ातिल बताना छोड़ दिया ।
मुझ पर तो तजरबे बहुत किए वो,मैंने भी तजरबा सीखा
कैसे कहूँ उसे शिद्दत से कभी,हर लम्स शदीद से चाही मैं
गिर-गिर के संभलना आ तो गया,पर घायल होने के बाद
हुस्न ज़ाम नहीं मैख़ाने का,सागर सा छलकाना छोड़ दिया
ख़ता दोहराने की ताब नहीं,जाने कैसे ख़ता इक बार हुयी
फिर दिल का जनाज़ा निकले,देना वो नजराना छोड़ दिया ।
कभी काज़ल के करिश्मों सा,चमका था चाँद सा नज़रों में
कभी ज़िक्र ज़ुबां ना लाऊँगी,मैंने कसम से सौगन्ध खाई है
हर चिन्ह खुरचके फ़ेंक दिया,जीने का ख़ज़ाना खोज लिया ।
मैंने ख़ुद ही शहर में ख़ुद की पहचान बनाना सीख लिया ।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह
सोमवार, 29 नवंबर 2021
" इस तरह टूट कर चाहा तुझे क्यूँ ऐ बेवफ़ा ज़िन्दगी "
इस तरह टूट कर चाहा तुझे क्यूँ ऐ बेवफ़ा ज़िन्दगी
हो रहा जर्जर वदन कुम्हला रहीं गात की कांतियां
पैरूख थका हक,अधिकार गया रह गईं विरानियाँ ।
शैल सिंह
गुरुवार, 25 नवंबर 2021
घड़ी भर लिए खुश्बू हुई जो जज़्ब सांसों में
घड़ी भर लिए ख़ुश्बू हुई जो जज़्ब सांसों में
चन्द लम्हों में हुई जाने क्या ऐसी करामात
अंतर को नहीं भाया दूजा फिर नया चेहरा
नशा बन के वो पल है आँखों में आत्मसात ।
दिल की पनाहों में महफ़ूज़ सुरमई वो शाम
यादों की तिजोरी खोलूं हो बेमौसम बरसात
घड़ी भर लिए खुश्बू हुई जो जज़्ब सांसों में
वह एहसास संजो रखे हैं अबतक ख़यालात ।
जुगनुओं सा जगमगा कर जाते हैं ख़ुराफ़ात
दिखा नया मंज़र फिर मेरी भोली आँखों को
ख़्यालों में अवारा घूमता ठहरा हुआ लम्हात
डर जाती खिड़की से गुजरता कोई अजनवी
कभी लरजे हँसी लब पे कभी आँखों में आँसू
कहे मतिभ्रष्ट मुझे जग या वाहियात गवारा है
जब भी निहारूं चेहरा नहीं बर्दाश्त दर्पण को
अक़्स नजरों में तेरी जो मैंने साक्षात उतारा है ।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह
बुधवार, 17 नवंबर 2021
कुछ शायरी
कुछ शायरी
रेशमी यादों का रेशा-रेशा,लपेट कर कंबल बना लिया है
जख़्म,वफ़ा,बेवफ़ाई शुमार कर जीस्त को दंगल बना लिया है
दिल का छीन गया क़रार बेक़रारी मार डालेगी
नज़र से नज़र मिली बस ज़रा सी क्या सफर मेें
के इश्क़ में हुए ये कारोबार बेज़ारी मार डालेगी ।
गोधूलि में मायूस होकर मग़र डूबता है
गुमां क़ामयाबी का अच्छा नहीं होता दोस्त
शीशे के मानिंद गरूर इक दिन मग़र टूटता है ,
चाहे जितनी मशक्क़त करले चेहरा,जुबाँ भाव छुपा लेने की।
ऐसी आड़ी तिरछी मुश्किलातें जिंदगी में,मेहनत रंग नहीं लाती
ईश्वर ने मुकद्दर तो बहुत उम्दा,अच्छा लिखा था
हम इतने बेख़याल हो गए कि गर्द चढ़ गई रिश्तों पर
जब पुराने रौ में लौटी तो लोग पहचानने से मुकर गए।
पंख उड़ानों को लगाती भी तो भला कैसे
हौसले औरों के आधीन औ पाबन्द जो थे।
बसाया था जिन आँखों में मुझे आँखों की पुतली बनाकर
उन्ही आँखों में किसी ने डाल लिया है डेरा बसेरा बनाकर ,
जीवन के इस विस्तार में बस,कुछ यादों का है बसा संसार
विचरित करने लगतीं जेहन में,जब बाँहों में भर-भर तन्हाई ।
गजल -- हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में
हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में
दुधिया आँचल फैलाए जवां रात है
रेशमी स्मृतियों की निर्झर बरसात है
खोल घूंघट घटा की चाँदनी चुलबुली
सजाई टिमटिम सितारों की बारात है ।
ख़ाब रूपहला सजाए हुए पलकें मूंद
सपनों की आकाशगंगा में तिरती रही
गदराई चाँदनी छिटक कर अंगना मेरे
मृदुल स्पन्दन सुप्त प्राणों में भरती रही ।
आलम ये खो जायेगा भोर की गर्द में
रंग बिखर जायेगा हुस्न और ईश्क़ का
कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में ।
तेरे सहन में भी हो ऐसी दिलकश रात
मची हलचल ख़यालों की बस्ती में हो
हर लमहा गुजारा जैसे तेरे इन्तज़ार में
तेरी भी यामा जग आँखों में कटती हो ।
कि बयां कर सकें बेचैनियां ऐ बेवफ़ा
बड़े ही तहज़ीब से यादें पहलू में बैठ
उर में कोलाहल सन्नाटा फैली फ़िज़ा
खुशी कुहराम मचा बैठी हड़ताल पर
बेसबब इन्तज़ार का शामियाना लगा
रचातीं अश्रुओं से हैं स्वयंवर रात भर ।
आखिर कबतक नज़रबंद दिल में रहें
रतनारी आँखों में घटा बनी घिरतीं रहें।
छुपाये रखा जिसे दश्त की निग़ाहों से
शोर बरपा गयीं उमड़ बरसी आँखों से ।
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह