शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

'' समय का फेर ''

  







                                  '' समय का फेर ''

कीमती से कीमती खिलौने भी पल भर में
आजकल के बच्चे झटके में तोड़ डालते हैं
सस्ते से सस्ते खिलौने भी शिद्दत से हम
अपने बच्चों के सहेज कर रखते ही रह गये
कहीं लोप ना हो जाये बालपन की निशानियाँ
अलमारियों पर हसरत से सजाते ही रह गए
कितनी दूर हो गए आज हृदय के टुकड़े मेरे
पर इन्हीं खिलौनों से आज भी झांक जाते हैं
बच्चों के बचपन के चंचल सुखद पल सुनहरे ।

                                       शैल सिंह 

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की

फड़फड़ाते हैं होंठ मगर कुछ कह नहीं पाते 
निग़ाहों में छुपे ख़्वाब फ़क़त पढ़ लिये होते 
हया से झुकी पलकों पे अंकित भावनाएं हैं 
वो दिल का दस्तावेज समझ पढ़ लिये होते ।

कबतक छुपाऊँ दास्ताँ दिल में मुहब्बत की 
सोचूँ कुछ भी तेरा ख़्याल आँखों में मँडराये 
कहाँ तक दबाऊं जिक्र तेरा लबों पे आने से 
जब सांसें ही उल्फ़त का अल्फ़ाज़ बन गायें ।

परखने में नहीं कच्ची इकतरफा नहीं कहना 
दिखा तेरी दीद में भी रूह से रूह का रिश्ता 
तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की 
मेरी ज़िंदगी में आजा ना तुम बनके फ़रिश्ता ।

फ़क़त---सिर्फ़ या केवल
दीद---आंखें

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

ग़ज़ल

कैसे वक़्त गुज़ारोगे बिना मेरे मुझे छोड़ने के बाद 
दिल को क्या कह बहलाओगे मुझे छोड़ने के बाद ।

तुझ से कौन करेगा मोहब्बत मुझे छोड़ने के बाद 
किसी और का न हो पाओगे मुझे छोड़ने के बाद 
जो मेरी ऑंखों में अश्क़ों का तोहफ़ा दिया तुमने 
तरस जाओगे तुम चाहत को मुझे छोड़ने के बाद ।

तेरा अपराध उजागर हो जायेगा मुझे छोड़ने के बाद 
कैसे तोहमतों को करोगे बर्दाश्त मुझे छोड़ने के बाद 
तन्हाईयों में भींगाओगे बालिश याद कर वफ़ाएं मेरी 
बस नावाकिफ़ लोग मिलेंगे तुझे मुझे छोड़ने के बाद ।

मुझ सा किरदार नहीं पाओगे मुझे छोड़ने के बाद 
हो जाओगे बदनाम ख़ल्क़ में मुझे छोड़ने के बाद 
ठुकराया जिनके लिए दिया दर्द की सजा मुझको 
मुझसा हमसफ़र नहीं पाओगे मुझे छोड़ने के बाद ।

दिल लगाना खता थी मेरी जाना मुझे छोड़ने के बाद 
लब से हटा ना पाओगे नाम मेरा मुझे छोड़ने के बाद 
जब भी खोल दरीचा झांकोगे दिल के आशियाने का 
कोई दूर तलक नजर ना आयेगा मुझे छोड़ने के बाद ।

ख़ल्क़---दुनिया
बालिश---तकिया या मसनद
नावाकिफ़---अनजान या अजनबी
दरीचा---खिड़की या झरोखा

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

सोमवार, 20 मार्च 2023

ईश्क़ में टूटकर बिखर जाना अगर ईश्क़ है

कैसे भूले गली तुम शहर की मेरे
निशां अब तक जहाँ तेरे पग के पड़े हैं
खुला दरवाजा तकता राह आज तक तेरा
पर्दे का ओट लिए खिड़की पे अब तक खड़े हैं ।

तेरे दीदार को दिल तरसता मेरा
तेरे इन्तज़ार में दिल कैसे तड़पता मेरा
क्या जानो पगले दीवाने दिल का हाल तुम 
कि मेरा होकर भी दिल तेरे लिए धड़कता मेरा ।

ईश्क़ में जख़्म तूने मुझे जो दिया
उसे अंजुमन में मैंने भी आम कर दिया
ईश्क़ में टूटकर बिखर जाना अगर ईश्क़ है
टूटे ख़्वाबों की विरासत भी तेरे नाम कर दिया ।

जाने कैसे रिश्ते में दिल बंध गया
धड़कना भूला पर भूला नहीं नाम तेरा
मिले तो सफर में बहुत लोग मुझको मगर
तड़प,बेचैनी,उलझन में बस तूं तेरी याद चितेरा ।

तोड़कर सरहदें जिद्द की एकबार 
बता जाओ आकर हो ख़फ़ा क्यूँ बेज़ार 
हुई ख़यालों में तेरे बावरी मशहूर हो गई मैं
राह अपलक निहारते थकके चूर-चूर हो गई मैं ।

सर्वाधिकार सुरक्षित 
शैल सिंह

रविवार, 22 जनवरी 2023

आँखों में ख़वाब तो सजा दे

आँखों में ख़वाब तो सजा दे

ना जाने हुई क्या रैन को मुझसे अदावत
कि नींद मेरी आँखों से कर बैठी बग़ावत ,

अचूक नुस्खे अपनाये नींद लाने के लिए 
मंत्र पढ़े अगणित बार आज़माने के लिए 
ना जाने अटकी कहाँ नींद किस मोड़ पर
गश्त करती फिर रही जाने किस छोर पर ,

ना तो ख़्वाबों में मैंने कोई मन्जर सजाया
न जाने हुई क्यूँ ख़िलाफ़त खंजर चलाया
ले-ले जम्हाई करवट फिरती रही रात भर
नींद तकिया से कुश्ती करती रही रात भर ,

क्यूँ कमबख़्त रूठी दृग से वजह तो बता
बेसबब विवाद कर ना तूं पलक को सता
ना तो किसी सपने लिए नींद गिरवी रखा
ना तो नीलाम की शब देती फिर भी सजा ,

नींद चुराने वाले का प्रतिबिम्ब दिखा तो दे
आँखें कर रही हैं शिकवा कुछ बता तो दे 
नींद ना सही पलकों पर ख़्वाब सजा तो दे
ऐ बेरहम रात ऐसी भी अब ना दगा तो दे ।

शैल सिंह 

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

बला की बरसात थी

 

  बला की बरसात थी

                                                              
दर्द का लावा जब फूटता ज़ख़्म-ज़िगर से
आंखों से दरिया बन बहता है बरसात सी ,

कभी इस बरसात में तुम भी भींगो अगर
तो जानोगे होती मजा क्या है बरसात की ,

घड़ियाली आंसू जो कहते हैं इस नीर को
एक कतरा तो देखें क्या इसमें बरसात सी ,

घटा के खामोश रौब का तो अन्दाज होगा
प्रलय मचा देता जब फटता है बरसात सी ,

जिस दिन अना मेरी मुझको ललकार देगी
फिर ना कहना कैसी बला की बरसात थी।

ग़ज़ल साज़िशों का तूं ही सैय्यद

साज़िशों का तूं ही सैय्यद


अक़ीदत को मेरी तुमने
इतना जख़म दिया है
दिल लगता नहीं मेरा
ख़ुदा तेरी इबादत में। 

मेरे एहतराम का कटोरा 
रीता किया है तुमने
तोड़ हस्ती का मनोबल
रूस्वा किया है तुमने।
मेरी शफ़्फ़ाफ़ कर्म निष्ठा
को घायल किया है तुमने
किस जुर्म की सज़ा हुई
ख़ुदा तेरी क़यामत में।

ख़िदमत में खोट थी क्या 
क्या आयत में मेरे ख़ामी
थी मुझसे क्या अदावत
क्या तौक़ीर से मेरे हानी
तेरे राजकोष से तो मैंने
कोई निधि नहीं चुराई
हुई हर बार हक़ की हत्या 
ख़ुदा तेरी इज़ाबत में।

तेरा नाम जपते-जपते  
छिल गई मेरी ज़बान
तेरे दर पे सज़दा कर-कर
मस्तक पड़ा निशान
साज़िशों का तूं ही सैय्यद
सुन हाकिम हूँ मैं हैरान
क्या खूब हुई व्यूह रचना
ख़ुदा तेरी सियासत में। 

चंद सिक्कों में बिक गया तूं
ख़ाहिशों का क़त्ल करके
मेरी बर्बादी का जनाज़
देखा बेफिक्र आँख भरके
गर्दिश में मेरी शख़्शियत
तेरी वजह से रहबर
रूठी हूँ मैं ख़फ़ा हूँ
ख़ुदा तेरी शरारत में।

उम्र भर के सारे तप को
धूसरित किया है तुमने
लाऊँ पहले सी कैसे उर्जा
पस्त हौसले किए हैं तुमने
ख़ुदग़र्ज़ तूं भी मालिक
शिकवा करुं भी किससे
झूठी वक़्त जाया की मैं 
ख़ुदा तेरी ज़ियारत में।

अहमक़ हुई मैं साबित
तुझसे आसरा लगा के
रहमोकरम पे ख़त्म तेरे 
इस जनम के सब इरादे 
शेष कितनी ज़िन्दगानी 
अब क्या होगा जाने आगे
कभी इसरार ना करुँगी
ख़ुदा तेरी अदालत में।

सलाहियत ना मेरी देखी
आलमग़ीर जबकि था तूं
रियासत में हुआ ज़ुर्म तेरे
इस रज़ा में जबकि था तूं
ना मुझसा कोई अफ़जल
ना आला सभा में ज़ालिम
हुई कितनी जालसाज़ी 
ख़ुदा तेरी सिफ़ारत में।

अक़ीदत--आस्था,   एहतराम--सम्मान 
शफ़्फ़ाफ़---पारदर्शी,   तौकीर--प्रतिष्ठा,  
इज़ाबत--स्वीकृति मंजूरी,  सैय्यद --सरदार,   
सियासत ---कूटनीति,   रहबर ---मार्गदर्शक,   
इसरार---आग्रह,   ज़ियारत --धर्मस्थल दर्शन,   
अहमक़---मूर्ख,   सलाहियत --योग्यता,पात्रता,   
आलमग़ीर विश्वव्यापी,    अफ़ज़ल --सर्वश्रेठ,   
सिफ़ारत --नुमाइंदगी अध्यक्षता।

                           शैल सिंह

सोमवार, 16 जनवरी 2023

ग़ज़ल '' तस्वीर से लिपट जिसकी जागी रात भर ''

तस्वीर से लिपट जिसकी जागी रात भर


बना के घरौंदा बिखेरा तिनका-तिनका
बताऊँ नाम कैसे  है फ़साने में किनका                        

दिल में दबाए रखा जज़्बातों का तूफ़ां
सुलगता  रहा ज़िगर  उठता  रहा धुवां
दम घुटा तमन्नाओं का खुली नहीं जुबां
हया के शिकंजे में है सैलाबों का कमां ,

ज़ख़्मों का लेके जत्था सिसकी उम्र भर
ऐसा ये मर्ज कोई दवा करती नहीं असर
तस्वीर से लिपट जिसकी जागी रात भर
वह अज़नबी सा गुजरा दरीचे से मेरे दर ,

क्या ख़ता थी मेरी क्या कुसूर बोलो मेरा
जिसे देख शाम ढलती होता नया सवेरा
जादूगरी में  माहिर फ़नकार इक मदारी
दिल ज़िस्म से निकाल के ले गया लुटेरा ,

उल्फ़त में चोट खाई खुलूश भी गंवाया
सूरत की ऐसी बिजली था शमां जलाया
लुटी रुख़सार की सुर्खी तब होश आया
कैसी हुस्न की रवानी गुलों से चोट खाया ,

पूछो राज उदासियों से तन्हाईयों से पूछो
गल रही हूँ मोम सी क्यूँ रानाईयों से पूछो
ये किसका साथ साया परछाईयों से पूछो
कौन यादों में यादों की गहनाइयों से पूछो ,

बेजान और बेदम है ख़ामोशी ऐतबार पर
मौसम ने ली क्यूँ करवट रंज है बहार पर
बेइन्तेहा ख़यालों में ज़ालिम के शुमार पर
दिल आईना सा चटका वादा-ए-क़रार पर ,

भर-भर कर दम वफ़ा का वफ़ादार बनके
ऐसे लुटा दिल मुक़म्मल सौ इक़रार करके
कितने रंग भर मोहब्बत के बेक़रार करके
कैसे मोड़ पे ला छोड़ा तनहा बीमार करके ।

                                                     शैल सिंह 

शुक्रवार, 3 जून 2022

'' ऐ हमनफ़स हमराही मेरे हमसफ़र ''

ऐ हमराही,हमनफ़स मेरे हमसफ़र 


फिर न जाने क्यों दिल आज बेचैन है
दो लाईन ग़ज़ल की ज़रा सुना दीजिए ,

ये गुंचे सितारे सिरफिरी ये मौज़े-हवा
दबी ख़्वाहिशों की सांकल दी हैं बजा
उम्र गुजरी मगर अधर नाम तेरा सजा ,

दफ़अतन छीन लिए आके शबे-चैन हैं
कोई नग़मा,नज़्म ज़रा गुनगुना दीजिए ,

दबाये रखा था आंधी जो करके जतन
बिजली अना की गिरा दे दगा ये पवन
आज़ दहका गयी फिर दिल की अगन ,

बे-कमां मारे दिल  पर फिर क्यों वैन हैं
छिन्न बीन के तार ज़रा झनझना दीजिए

तेरा शहर छोड़ी थी बस यादों के सिवा
ज़ख़्म दिल के ढूँढ़ने फिर क्यूँ आई हवा
हर घाव था भर दिया वक़्त ने बन दवा ,

माज़ी से कर गई फिर मुज़तरिब रैन है
यास की गली में ज़रा गुंचे बिछा दीजिये

दफ़अतन--अचानक , अना--अस्तित्व
वैन--बाण , बे-कमां--बिना धनुष के 
माज़ी--अतीत , मुज़तरिब--विचलित, 
यास—-मायूसी

                                   शैल सिंह 

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

आँखों की करामात पर ग़ज़ल


     आँखों की करामात पर ग़ज़ल


आँखों को मैंने अपनी घटा बना लिया है
उमड़ कहीं न कह दें दिल का राज सारा
इसलिए रख अधरों पे मुस्कान की डली
भींगती रोज भीतर देख अन्दाज़ तुम्हारा ,

निग़ाहों के लफ़्ज़ों से कशमकश में हूँ मैं
फंसी कैसी दुबिधाओं के कफ़स में हूँ मैं
तुम कैसे बाज़ीगर हारा एहतियात सारा
तिलस्मी बड़ा दीद का अल्फ़ाज़ तुम्हारा ,

धड़कनों की सरहद पार आ थे जब गये
निग़ाहों के समंदर उतर नहा थे जब गये
तो कह जाते दिल का भी जज़्बात सारा
बेज़ार करता है नि:शब्द सौगात तुम्हारा ,

ऐसे गुमनाम हुये तुम दे प्रीत की तावीज़ 
क़त्ल किये सुकूं का औ बने भी अज़ीज़ 
निग़ाहों में रख चलते तुम हथियार सारा 
ख़ंजर से तेज किया है मौन वार तुम्हारा ,

तेरे नैन जो किये थे नादाँ दिल से सुलूक 
खिल गये थे गुल प्यार के उद्गार हैं सुबूत 
कर दिया है बयां लिखकर हालात सारा
शायद हो कभी मुझसे मुलाक़ात तुम्हारा ।

कफ़स--- पिंजरा
सर्वाधिकार सुरक्षित 
              शैल सिंह 


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

ढलती ज़िन्दगी पर कविता

ढलती ज़िन्दगी पर कविता



थोड़ी मोहलत मिली थोड़ी फ़ुर्सत मिली
तो मिला तोहफ़े में तन्हाई और अपनों का बिछुड़न
गाड़ी बंगला मिला ऐश्वर्य,शोहरत मिला
तो मिला ढलते वय में पदार्थ सब टिसता चुभन 
ज़िन्दगी तेरी आवश्यकताओं के वसन्त बीत जाने के बाद ,

सोचती हूँ जी लूँ जी भर कर तुझे
अधूरी ख़्वाहिशें खरीद लूँ झोली भर के
कभी सपने नयन में जो अंगड़ाई लिये थे
सोचती हूँ कर लूँ उपलब्ध उन्हें साकार कर के
मगर तुझसे शिकवा आज यही ज़िंदगी 
कोई आह्लाद नहीं गुजरे कल की अनुभूति सी
मधुर ज़िन्दगी का बेशक़ीमती वसन्त बीत जाने के बाद ,

कुछ मर्यादाओं,प्रथाओं का बंधन 
कुछ विवशताओं की अपनी कहानी
बेमुरव्वत था वक़्त और किस्मत,सम्बन्धी भी
कुछ लाचार परिस्थितियों में बीती जवानी
बहुत शिकवा है ज़िन्दगी तेरे वर्तमान से
उलाहने प्रचुर,बीत गए कल को मेरे आज से
वर्तमान तूं भी मिला हसरतों का वसन्त बीत जाने के बाद ,

उत्तरदायित्वों के निर्वहन में आकर्षण गया देह का 
सुन्दर परिधान आभूषण अब किस काम के
ना तो यौवन के तरुणाई की चमक औ धमक
नैनों में ज्योति ना पैरूख रहे अब किसी धाम के
व्यस्त संतानें ख़ुद के व्यवसाय में,सब बिछड़े स्वजन
दसन,पाचन भी अशक्त,सुखभोग निष्काम के
जो मिला,ज़िन्दगी के शौकों के वसन्त बीत जाने के बाद। 

दसन--दाँत

 शैल सिंह 


शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

फिर भी मन का प्यासा प्याला रीता

फिर भी मन का प्यासा प्याला रीता


ये कैसा मलाल है ज़िंदगी 
कि आज़ाद भी हूँ और बेबस भी
भीड़ में भी हूँ और तन्हा भी
मन का ना कर पाने का मलाल 
सब कुछ देखते समझते 
स्थितियों की बेबसी का मलाल
कला,दक्षता,ख़ूबी,हावी,हुनर,फ़न 
को बेबसी की मृतशैय्या पर 
कराहते देखने का मलाल
संवार कर रखूँ तो भी बीमार
निखारकर रखूँ तो भी बिमार 
इन्हीं बेबसी के लम्हों की तड़प को 
अपने लफ़्ज़ों से नवाज़ा है मैंने
कविता,शायरी,गीतों,ग़ज़लों की 
शक्ल और सूरत के रूप में
अपनी भावनाओं को उतारा है मैंने
बग़ावत करूँ तो तनाव में 
चुप रहूँ तो तनाव में
ये कैसा मलाल है ज़िंदगी 
कि आज़ाद भी हूँ और बेबस भी
एक-एक पल एक-एक दिन के रूप में
ज़िन्दगी का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा
आँखों के सामने से निकलता जा रहा
मन के भीतर कुछ टूटता रहा,कुछ कसकता रहा 
मैं बिखरती रही,उमर बीतती गई 
ना मन का तम छँटा ना मन की आग बुझी
बीते वक़्त को याद कर पछताने के लिए 
मन को धैर्य से बाँध-बाँध अवसर गँवाती गई 
बस कल्पनाओं की चादर तले
नभ की चाह बाँधे आँचल में
जीवन का लहराता हुआ सागर
फिर भी मन का प्यासा प्याला रीता
ना जाने ये कैसी अनबूझ प्यास है
ना जाने ज़िन्दगी से ये कैसी आस है
ये कैसा मलाल है ज़िंदगी 
कि आज़ाद भी हूँ और बेबस भी 
कुछ कीर्तिमान रचाने की अभिलाषा 
कुछ जीवन के इतिहास में 
सुनहरा अध्याय जोड़ने की अभिलाषा 
प्रतिकूल परिस्थितियों में जज़्ब होकर
रह गए साँसों के जज़्बे 
काँटों भरी पथरीली पगडंडियों पर
बिखरकर रह गए हौसले मेरे 
सपनों के कगार पर खड़े रह गए 
जुनून और दृढ़ ईच्छाशक्ति के फ़ौलादी इरादे
मन के दर्पण में निहारती 
अपने सपनों का संसार 
मनोभावों को साकार रूप दिया है 
मेरी लेखनी की मूक स्याही ने
जो मन के हाहाकार से छेद,बेंध पन्नों को
कराती हैं आत्मबोध 
यहीं आकर ठहरती है मेरी ज़िद
यहीं पूर्ण होता सन्तोष
ये कैसा मलाल है ज़िंदगी 
कि आज़ाद भी हूँ और बेबस भी ?

                 शैल सिंह 









सोमवार, 20 दिसंबर 2021

एक दीवाना ऐसा भी

              '' एक दीवाना ऐसा भी ''

तुझ पर नज़्म लिखूं या शायरी 
कि  ग़ज़ल  लिखूं  या  कविता 
जीवन तुझपे सहर्ष ही वारूँ,या
बरसा दूं उर की तरंगित सरिता ,

साज़ भी तुम और तुम्हीं तराना  
कन्ठ का सुर,लय,ताल भी तुम   
विश्वास करो मेरे नग़मों का भी 
ख़ूब सुन्दर सी आवाज भी तुम ।

तकदीर बनाने  निकला  घर से
हाय चंद्रमुखी का हुआ शिकार
झट नीलाम  भावना  कर  बैठा
भरमा गई मन चितवन की धार,

तूं अनमोल कृति  किस सर्जक 
की, उसको सलाम मैं करता हूँ
सच्च अद्भुत ख़ुदा की नेमत हो
नामुरादों  की नज़र से डरता हूँ ।

तुम बेमिसाल कली गुलशन की
मैं मदमस्त भंवरा अलबेला तेरा
सारी दुनिया निसार दूँ कदमों में
कहो तो शाद से बहार बन  तेरा ,

लगे जन्नत  शबाब तेरा जानम
लगे तूं ताजी गुलाब बगिया की
रंभा,उर्वसी जैसी तुम लाज़वाब
आठों पहर माहताब दुनिया की ।

तेरी झील सी उन्मत्त आँखों में
डूबूँ उतराऊँ जिया मचलता है
मैं ठहरा  इक बदनाम अनाड़ी
गली तेरी जाने से जी डरता है ,

शाहकार आँखों का दोष है या
तूं है कोई देवलोक की अप्सरा
इन उपमानों के आगे यही लगे
दुनिया  की थिसारस  भी जरा ।

सारी उम्र गंवा दी मैंने जुनून में
बस इक तेरी याद सजा देने में
कैसे काटा सफ़र तनहा-तनहा
देखा हुआ  ख़्वाब भुला देने में ,

आँखों  के रस्ते  दिल में उत्तर
क्यों  रूह  में हल-चल भर दी
अपनी बेबाक़ अदा से घायल
जां-ज़िगर को  पागल कर दी ।

तेरे घुँघराले ज़ुल्फ़ों के पेंचों में
मैं ऐसा उलझा उबर नहीं पाया
तेरा कोई और है क्या परवाना 
जो मैं दीवाना नज़र नहीं आया ,

जिन केशों की घनेरी छाँव तले
मेरा दिन रात का सुखद बसेरा
निगल ना ले  फ़ैशन की आँधी
कहीं उजड़ ना जाये ये घर मेरा ।

पूरब-पच्छिम दिन-रात भी मैं
अराध्य देवों को भी भूल रहा
हर वक़्त समायी ज़ेहन में तुम
लगे तेरे ज़िहन में मैं झूल रहा ,

निग़ाहों से शरारत तुमने किया
हाय बर्बाद हुआ लोग कहते हैं
बिखरी ज़ुल्फ़ें फिरूँ बावरा सा
क्या इसे ही मोहब्बत कहते हैं ।

तूं तो रूप की ऐसी मधुशाला
छलकाई आँखों से जो पैमाना
होश गंवा बैठा ऐसा ख़ुमारी में
सेहरा में है घायल पड़ा दीवाना ,

अल्हड़ सी ग्रीवा झुकाती जब
तुझे हिक भरकर नज़र निहारे
कभी मेरी ओर पलट देखो जो
दिख जाते दिन में भी तारे-तारे  ।

तुम्हारी क़ातिल अदायें शातिर
मैं था बेक़सूर  यूँ ही मारा गया
पीता न कभी था शिकवा यही
निग़ाहों से क़सम पिलाया गया ,

पूरन के चाँद  सी दिखतीं तुम
दिल में ज्वार  ऊफन आता है
जब-जब चकोर बन निरखूँ मैं
चाँद ये बदली में छुप जाता है ।

मेरी रात  सितारों  से भर  दो
फिर कभी बात  बने कि नहीं
जरा गौर से देख लूं ठहरो तो
फिर मुलाक़ात ये हो कि नहीं ,

मंजिल दोनों की अलग-थलग
राहें भी  सफ़र की ज़ुदा-ज़ुदा
फिर मिलें कभी या नहीं मिलें
ये तो जाने बस तेरा मेरा ख़ुदा ।

अहसासों को  आम किया ना
निग़ाहों की जुबां  से पढ़ लेतीं
मैखा़ने सा सुरूर था आँखों में  
डर था थप्पड़  तुम जड़  देतीं ,

क्यूँ हक़ीक़त है छुपाती पर्दे में
क्या 'शै' है कि भूल नहीं पाता
साक़ी बन मस्ती सांसों में भरी 
अधरों पे वंशी गीत वही गाता ।

जाना जब था फिर आई क्यों
बहाना कोई  बना दिया होता
यूँ बज़्म से उठ झट चली गईं 
तराना कोई  सुना दिया होता ,

चल दी ऐसे गिराकर नज़रों से
अपमान भूला नहीं पाता हूँ मैं
रहती हर पल याद की ज़द में 
पर तुझसा नूर नहीं पाता हूँ मैं ।

चिलमन से उठाकर परदा तुम
बेहिसाब संगीन शरारत की हो
पत्थर की मोम सी प्रतिमा बन
चाहत के साथ तिज़ारत की हो,

आहें भरूं या पीऊँ मय छककर
कि तूं याद नहीं आओ हरजाई
बेपनाह मोहब्बत है ज़िन्दगी से
क्यों बे-अमल कर गई रुसवाई ।

वीरां-वीरां दिल की हवेली मेरी  
ख़ुद का मुद्दत से एहसास नहीं
ख़ुद को भूला हूँ तेरे ख़्यालों में
मजबूर हूँ पर अब बेआस नहीं

नग़मों में पिरो-पिरो गा लेता हूँ
कैसे ज़खम भला मैं दिखलाता
भर लेतीं जो  कभी बाहुपाश में
मुझमें सारा ख़लक समा जाता ।

दिल के तख़्त तुम्हें बिठाता मैं
जिस्म यह काश तुम्हारा होता
गुनगुनाता बेच ख़ुशी हाथों तेरे
सुकून से हर रात गुजारा होता ,

इस ईश्क़ में पागल मैं ही नहीं
घायल तूं भी  मुझसे कम नहीं
यहाँ दर्दे ज़िगर  बेहद तो क्या
तड़प तेरी भी मुझसे कम नहीं ।

नित्य अश्क़ों का ज़ाम हूँ पीता
लब सी दिल जार-जार है रोता
सनम हरजाई हँसी उड़ातीं तब
हाल-ए-दिल जो लतीफ़ा होता ,

दुनिया जी बहलाती थी मुझसे 
मुझपे ही सोजे-क़हर ग़म बरपा
अनजाने में हिमाक़त  कर बैठा
देखो दिल चाक्-चाक् है दरका ।

महफ़िल का तेरे ऐ जाने-ज़िगर
कितना अद्भूत दस्तूर निराला है
कि इक बूँद को तरसे मतवाला
यहाँ मय का छलकता प्याला है ,

मैं तेरी ही खातिर देवदास बना
तूं भी पारो मेरी  ग़र बन जातीं
तो दुनिया की बेमानी चीजें भी
कसम तुम्हारी सोना बन जातीं ।

मैंने तुझे रिझाने की ख़ातिर ही 
कैसा ख़ुद पर अत्याचार किया
मन मुरादों की अधीर बेचैनी में
ना जाने कैसा व्यभिचार किया ,

तूं ही तूं आए  हर तरफ नज़र
जिस तरफ निराश नज़र जाए
मनमौजी मूरख नज़र ठगी सी
इश्तिहारों पे भी जा ठहर जाए ।

हसरतों की  होली जला प्रिये  
भस्मों को अंगों  में रहा लपेटे
जैसे सर्प नेह से संदल दरख़्त  
जकड़कर अंकों में रहा समेटे , 

इस मृगतृष्णा से पहले सनम 
मैं था कितना  बिन्दास कभी
बड़ा मासूम सा था मुखमंडल
आ कहता आईना पास अभी ।

मेरी अहदे-वफ़ा लम्हातें हसीं
क्या थीं तुझको एहसास नहीं
तेरे दर से गुजरा बस राहे जुनूँ
अंजाम होगा क्या परवाह नहीं ,

कितनी तहरीरें वफ़ा की मैंने
लिख कर तामीर बना डालीं
देकर दिल के मुंडेरों पे सदा
हर हर्फ़ें ख़ामोश सुना डालीं ।

जलवा बिखेरतीं शबे-फ़िराक़
क़ातिलाना शरारतें कर जातीं
डूबो-डूबो सपनों  के सागर में
तन्हा रातों में सपने भर जातीं  ,

बेदस्तक़ आती मेरे ख़यालों में
दिल मेरा वाग्-वाग् हो जाता है
प्रतिदिन महका जाती हो सांसें
अरमां मचल-मचल मुस्काता है।

तेरी स्मृतियों के दीप जलाकर 
शबे-हिज्रां उन्माद  में बहता हूँ
साथ ऐश्वर्य माज़ी का इतना है
रेज़े ज़ख्मों के सहेजा करता हूँ  ,

दु:खते लम्हात भी जाते गुजर 
यादों का साथ कारवाँ होता है
उजड़े चमन में कहाँ अकेला मैं
संग ग़म-गुसार बाग़वां होता है ।

लब पर नाम तेरा ऐ संगेमरमर 
पुतली बन आँखों में  रहती हो
नहीं रंज बिछड़ने का बस यार 
तबियत से मौसमे-ग़म देती हो ,

तक़दीर भले किसी और की तूं
हो किसी और के मठ की मूरत
शुक्र है कि मुझ आशिक के भी
दिल में समायी रहती तेरी सूरत ।

इस दर्द में भी मिठास है इतना
रख अंबार ज़ख्मों का शानों पे
उदास ज़िन्दगी ठिठक जाती है 
सुन तेरे से अनुरूप सा नामों पे  ,

हो गया दीवाना या पागल मैं
कोई हाल तुझे मेरा बतला दे
किस शहर में है तूं आजकल 
कोई जरा पता तेरा बतला दे ।

सपना बन इतराती आँखों में
पलकों की छत पर आओ ना
क्या सबब है मेरी तबाही का
जरा दुनिया को बतलाओ ना ,

नित सपनों के समन्दर में बहता 
बेलगाम मौज़ों का मजा हूँ लेता 
तह भीतर छुपकर बैठा रहता हूँ
कश्ती तट पे निडर सजा हूँ देता ।

घर-घर छाई  जग-मग  दीवाली
घर में ही दीप जलाना भूल गया
क्यूँ कि दिल का चराग़ है रौशन
ख़ुद को भी तो हूँ जैसे भूल गया ,

फिरता हूँ दीवानों सा गली-गली
जहाँ कहता मुझे लफ़ंगा लोफ़र
नख-शिख तक डूबा तेरे कर्ज़े में 
दिये तूने जितने हयात में ठोकर ।

मैं तो ठहरा सच्चा प्रेम पुजारी
होंठों पे मुहर लगा धुनी रमाता
मन मन्दिर की मूरत  बना तुझे
देख दहर को अखर क्यूँ जाता ,

सूख गई होगी सनम छुहारे सा 
प्रियतम की  लरज़ती  बांहों में
मेरे ज़ज्बों का  शज़र हरा-भरा 
सींच रखा अश्क़ों की फ़ाहों में ।

दर्द पिघल शबनम की बूँद बना
भींगे काठ सा सुलगूँ तिल-तिल
फिरता रहता बस जंगल-जंगल
सर्द रातें संग यादों की महफ़िल ,

किस जगह कहाँ कब तुझे नहीं
तलाशती रहतीं हैं बेज़ार निग़ाहें
क्या ख़बर इन्हें कि तुम्हारी अब  
बदल सी गईं हैं मगरूर  निग़ाहें ।

कितना रूतबा है मुझ दीवाने का
किसी परिचय का मोहताज नहीं
अमीरी का सनद कृपा तुम्हारी है
लज्ज़ते आलम बस है नाज़ यही ,

यदि महाप्रलय आया डर लगता
और लील ना जाए सारी दुनिया
लेश परवाह ना ख़ुद की मुझको
कहीं लील ना  जाए मेरी दुनिया ।

मेरे दिल में दफ़न तुम्हारी तस्वीरें
क़रीने से सजा रखा हूँ ख़यालों में
हर पल महके एहसास की ख़ुश्बू
रहता शाद अत्यंत इन जंजालों में ,

मिल्क़ियत तुम्हीं हो दिल की मेरे
रचना की कालजयी कविता मेरी
इस विरासत की तुम हो साम्राज्ञी
हो समग्र ज़िंदगी की सम्पदा मेरी । 

                               शैल सिंह
































गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

" ओ पत्थर के दिल वालों,अब देखना मेरी मौज-ए-रवानी "

'' ओ पत्थर के दिल वालों,अब देखना मौज-ए-रवानी मेरी ''

वीरां-वीरां हुआ गुलशन,फूलों ने भी महकना छोड़ दिया
जब मन से नहीं अनुबन्ध,रूह ने भी भटकना छोड़ दिया
औरों ने ठिकाना बना लिया,जब सुना सनम की बस्ती में
घटायें तो घिरीं सावन सी, आँखों ने बरसना छोड़  दिया ।

वक़्त के हाथों जख़्मों पर,ख़ुद वक़्त ने मरहम लगा लिया
इक वक़्त था जलते थे,शमां यादों का जलाना छोड़ दिया
क्यों ज़ख्म जहाँ को दिखलाऊँ,कर दी दर्द दफ़न सीने में
देख नासूरों को  तिल-तिल,घुट-घुट मर जाना छोड़ दिया ।

मैं नहीं वो परवाना फतिंगा,जल ख़ाक़ में ज़िस्म मिला दूँ
उड़-उड़कर बैठना दीयों पर,जुनूँ में मंडराना छोड़ दिया
दे दे सदाएं बस्ती-बस्ती,मेरी वफ़ा का लाश लिए फिरना
ये दरों-दीवारें दहलीजें,खुला दरीचा रखवाना छोड़ दिया ।

जिस शज़र के हर शाखाओं पर,आजाद परिंदा रहता था 
उस शाख़ की कोमल कलियों ने,भी इठलाना छोड़ दिया
चिताएं सजा कर चाहतों की,दरिया में राख बहा डाली मैं
क्यूँ देखूँ अदा काँटों की,दिल फूलों से लगाना छोड़ दिया ।

गुंथे जिनके जिक्रों के मनके,मैंने बंद,शेर,ग़ज़ल रुबाई में
उनमें डूब के अब गाना,अफ़सानों का तराना छोड़ दिया
कभी दिल शाद किये थे,काढ़ कसीदे जिनकी तारीफ़ों से
जो क़त्ल किया दिल का,उसे  क़ातिल बताना छोड़ दिया ।

सजा जिन ख़्यालों के गुल से बज़्म,अष्ट पहर शिराओं में
उसकी धृष्ट हक़ीक़त देख,दिल को धड़काना छोड़ दिया
मुझ पर तो तजरबे बहुत किए वो,मैंने भी तजरबा सीखा
कोई इल्ज़ाम ना उसपर आये,इल्ज़ाम लगाना छोड़ दिया ।

कैसे कहूँ उसे शिद्दत से कभी,हर लम्स शदीद से चाही मैं
उस सैय्याद की बुलबुल ने ही,वफ़ा आजमाना छोड़ दिया
मेरा ज़िगर नहीं संगमरमर का,दिल पे चोट ख़ुशी से खाए
कोई रुपसी देख ज़ेहन उसके,नज़रों में बसाना छोड़ दिया ।

गिर-गिर के संभलना आ तो गया,पर घायल होने के बाद
हुस्न ज़ाम नहीं मैख़ाने का,सागर सा छलकाना छोड़ दिया
ख़ता दोहराने की ताब नहीं,जाने कैसे ख़ता इक बार हुयी
फिर दिल का जनाज़ा निकले,देना वो नजराना छोड़ दिया ।

कभी काज़ल के करिश्मों सा,चमका था चाँद सा नज़रों में  
तोड़ा ऐसा ऐतबार के चाके-दिल,नज़रें मिलाना छोड़ दिया
कभी जिन केशों की वेणी में,फूल हजारों वफ़ा का टाँके थे
उसे देख अदा से लहराना,लटें रुख़ पर गिराना छोड़ दिया ।

क्यों ख़ुद को रखूँ भूलावे में,ग़म ढाल कर ग़ज़लों,गीतों में
दिल के नगर से नाम मिटा,राहत का ठिकाना खोज लिया
कभी ज़िक्र ज़ुबां ना लाऊँगी,मैंने कसम से सौगन्ध खाई है
हर चिन्ह खुरचके फ़ेंक दिया,जीने का ख़ज़ाना खोज लिया ।

अरे पत्थर के दिल वालों,अब देखना मौज-ए-रवानी मेरी
बहती हुई दरिया ख़ुद मैं,ख़ुद ही राह बनाना सीख लिया
कहीं इस भीड़ का हिस्सा बन,मैं भींड़ में ही खो जाऊँ ना
मैंने ख़ुद ही शहर में ख़ुद की पहचान बनाना सीख लिया ।

मनके--माला ,  शदीद--गहराई ,  
चाके-दिल--घायल हृदय,

                                         सर्वाधिकार सुरक्षित       
                                                       शैल सिंह



सोमवार, 29 नवंबर 2021

" इस तरह टूट कर चाहा तुझे क्यूँ ऐ बेवफ़ा ज़िन्दगी "

इस तरह टूट कर चाहा तुझे क्यूँ ऐ बेवफ़ा ज़िन्दगी 


रफ़्ता-रफ़्ता घिस रहीं ज़िन्दगी की पुष्ट बैसाखियां
हौले-हौले काया ढले शनैः शनैः हुस्न की रानाईयां 
रूख़सार की लाली पे खींची आड़ी-तिरछी झुर्रियाँ
हिक़ारत से देखता आईना पड़ी शक्ल पर झाईयाँ ।

हस्ती मिटी बल गया बढ़ रहीं दबे पांव परेशानियां
रूतबा गया तेवर भी गया शिथिल हो रहीं इन्द्रियां
हो रहा जर्जर वदन कुम्हला रहीं गात की कांतियां
पैरूख थका हक,अधिकार गया रह गईं विरानियाँ ।

अखरे उम्र का वेग बढ़ता,बढ़ती जा रहीं तन्हाईयां
उड़ गये पंछी सेहन के थीं कभी गुलज़ार टहनियाँ
वैसे तो सफर मे बेशुमार चलते स्मृति के काफिले 
पर गूँजतीं नहीं कर्णों में मकरन्द सी किलकारियाँ ।

जीवन की लरजती छांव में बेकाम की निशानियाँ
रह गईं गुजरे लम्हातों  की कुछ धुंधली परछाईयाँ 
भटक रही माज़ी के गांव में हटा के दर्द का मल्बा
डूबता सूर्य ढलती सांझ,शेष निशा की ख़ामोशियां ।

लगे शुष्क सा आस्मान,बदलीं फ़िज़ा की झांकियाँ  
वक़्त बहता नामुराद बहें जैसे निकाल राह नदियां
मरूथल को सरोकार क्या ऋतुराज के आग़ाज़ से 
कहाँ मिटा पाई वर्षा मरूभूमि की फटी बिवाईयाँ ।

लचक रहीं शाखें देह की निढाल होतीं अंगड़ाईयाँ
स्फूर्ति पांव की गई जो थिरका कीं सुन शहनाईयाँ
इस तरह टूटकर चाहा तुझे क्यूँ ऐ बेवफ़ा ज़िन्दगी
किश्तों-किश्तों में कुतर गई सपनों की सुघराईयां । 

खा गई शैशव की शबनमी अल्हड़ भरी नादानियाँ
गदराये यौवन की लीली सुनहरी रेशमी दोपहरियाँ
कुछ पल सहेज रखा उर के बियाबान सायबान में
उम्र के अवसान में संग निभा रहीं ग़ज़ल,रूबाईयाँ ।

माज़ी—-अतीत,  बियाबान—वीरान,  
सायबान—-छाजन या छाया

  सर्वाधिकार सुरक्षित
                        शैल सिंह

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

घड़ी भर लिए खुश्बू हुई जो जज़्ब सांसों में

घड़ी भर लिए ख़ुश्बू हुई जो जज़्ब सांसों में 


बस आँखें हुईं थीं चार इतनी सी मुलाक़ात 
चन्द लम्हों में हुई जाने क्या ऐसी करामात 
अंतर को नहीं भाया दूजा फिर नया चेहरा
नशा बन के वो पल है आँखों में आत्मसात ।

दिल की पनाहों में महफ़ूज़ सुरमई वो शाम 
यादों की तिजोरी खोलूं हो बेमौसम बरसात 
घड़ी भर लिए खुश्बू  हुई जो जज़्ब सांसों में
वह एहसास संजो रखे हैं अबतक ख़यालात ।

यादों में,ख़्वाबों  में कभी आ बैठें पलकों पर
जुगनुओं सा जगमगा कर जाते हैं ख़ुराफ़ात 
दिखा नया मंज़र फिर मेरी भोली आँखों को
मनाकर जश्न रातों में चले जाते मचा उत्पात ।

है याद अभी वो ठौर पी जहाँ नज़र का जाम
ख़्यालों में अवारा घूमता ठहरा हुआ लम्हात 
डर जाती खिड़की से गुजरता कोई अजनवी 
चुरा ले न मोती नैनों के वो दे नैनों की सौगात ।

कभी लरजे हँसी लब पे कभी आँखों में आँसू
कहे मतिभ्रष्ट मुझे जग या वाहियात गवारा है 
जब भी निहारूं चेहरा नहीं बर्दाश्त दर्पण को
अक़्स नजरों में तेरी जो मैंने साक्षात उतारा है ।

सर्वाधिकार सुरक्षित 
                   शैल सिंह

बुधवार, 17 नवंबर 2021

कुछ शायरी

                     कुछ शायरी


जब ग़म मुश्किल हो जाए सीने में ज़ज़्ब करना
भींगो लेना अश्कों की कलम से पन्नों का सीना
ये सिसकियां भी इक दिन बन जाएंगी फसाना
ग़म जाहिर कर जमाने को कभी मौका ना देना,
दर्द हर्फ़ों के लिबास में जब्त पन्नों पर कर लेना
नींद की आगोश में करवटें बेफिक्र हो भर लेना । 


कभी ख़ुशग़वार हो बहारें गुजरती थीं बगल से
आज अहदे-खिजां दे गुजर गईं यूँ सर्र से बगल से
मासूम यादें खूब रोईं लिपट कर ख़्यालों की गुदड़ी से  
जैसे लड़खड़ा कर बिखर जाते मायूस हो पत्ते दरख़्त से
वैसे तो बहुत सारे दस्तावेज पास तन्हाई बहलाने के मग़र
यादें ज़ेहन के दीवारों दर खड़ीं खण्डहर सी माज़ी की मग़र। 


तेरी भेंट की हर चीज को जीने का संबल बना लिया है
रेशमी यादों का रेशा-रेशा,लपेट कर कंबल बना लिया है
आँखों में तेरी तस्वीर बसा ज़िन्दगी को संदल बना लिया है
तेरे ख़्यालों में सुलगते रहना ज़िन्दगी को जंगल बना लिया है
जख़्म,वफ़ा,बेवफ़ाई शुमार कर जीस्त को दंगल बना लिया है
गुजरे लम्हों की परछाईयाँ,लिखे ख़तों को भूमंडल बना लिया है। 

मेरे शब्दों को ग़ज़लों की,इबारत भर मत समझ लेना 
मेरे रूह की भींगी अल्फ़ाज़ों,की झनकार हैं ये ग़ज़लें 
ज़िन्दगी जिन हर्फ़ों के सुर,सप्तक लब पे न सजा पाई 
उसे पन्नों पे लिखे ताकि रूह को झकझोर दें ये ग़ज़लें।

कितना करूँ ऐतबार ये इन्तज़ारी मार डालेगी
दिल का छीन गया क़रार बेक़रारी मार डालेगी
नज़र से नज़र मिली बस ज़रा सी क्या सफर मेें
के इश्क़ में हुए ये कारोबार बेज़ारी मार डालेगी ।

बड़ी ताब लेकर निकलता है सूरज
गोधूलि में मायूस होकर मग़र डूबता है
गुमां क़ामयाबी का अच्छा नहीं होता दोस्त
शीशे के मानिंद गरूर इक दिन मग़र टूटता है ,
                                           

लोगों के लहज़े,अंदाज़ बता दिया करते हैं दिल में छुपे राज
चाहे जितनी मशक्क़त करले चेहरा,जुबाँ भाव छुपा लेने की।
               

ऐसी आड़ी तिरछी मुश्किलातें जिंदगी में,मेहनत रंग नहीं लाती
भगवन इतनी अच्छी नींद दे देना कि सपने देख मगन तो हो लूँ ।
                              
ईश्वर ने मुकद्दर तो बहुत उम्दा,अच्छा लिखा था 
मग़र बदइंसानों ने कीं हर बार साथ नाइंसाफियाँ ।
                                    
हम इतने बेख़याल हो गए कि गर्द चढ़ गई रिश्तों पर
जब पुराने रौ में लौटी तो लोग पहचानने से मुकर गए।

पंख उड़ानों को लगाती भी तो भला कैसे
हौसले औरों के आधीन औ पाबन्द जो थे। 


बसाया था जिन आँखों में मुझे आँखों की पुतली बनाकर
उन्ही आँखों में किसी ने डाल लिया है डेरा बसेरा बनाकर ,

धैर्य का दामन थामे मुश्क़िलाते आसां कीजिये
ज़िन्दगी है एक इम्तिहान,इम्तिहान देते जाईये ,

ऐ चाँद उतर आना चुपके से   
इक रात मेरे भी दरीचे में 
ख़ाहिशों के जुगनू जगमगा कर
छुप जाना बादल के कूचे में ,
                                        
कुछ अहसासों के ख़ुश्बू पास कुछ यादों के जुग़नू पास 
कुछ बचपन के गुजरे लम्हों की ,भूली बिसरी यादें साथ 
जीवन के इस विस्तार में बस,कुछ यादों का है बसा संसार
जब-जब पूरवा बहे अतीत की तब-तब यादों की पड़े फुहार 
पलकों का आँगन नम कर जातीं कितने शक़्लों की परछाई
विचरित करने लगतीं जेहन में,जब बाँहों में भर-भर तन्हाई ।   



गजल -- हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में

हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में 

दुधिया  आँचल  फैलाए  जवां रात है
रेशमी स्मृतियों की निर्झर बरसात है
खोल घूंघट घटा की चाँदनी चुलबुली
सजाई टिमटिम सितारों की बारात है ।

ख़ाब रूपहला सजाए  हुए पलकें मूंद
सपनों की आकाशगंगा में तिरती रही
गदराई चाँदनी छिटक कर अंगना मेरे
मृदुल स्पन्दन सुप्त प्राणों में भरती रही ।

मद्धिम हो जायेगी चाँदनी की उजास
आलम ये खो जायेगा भोर की गर्द में
रंग बिखर जायेगा हुस्न और ईश्क़ का
कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में ।

तेरे सहन में भी हो ऐसी दिलकश रात
मची हलचल  ख़यालों की  बस्ती में हो
हर लमहा गुजारा जैसे तेरे इन्तज़ार में
तेरी भी यामा  जग आँखों में कटती हो  ।

लफ्ज़ गूंगा तराशूं किन उपकरणों से
कि बयां कर सकें बेचैनियां ऐ बेवफ़ा 
बड़े ही तहज़ीब से यादें पहलू में बैठ
दर्द देतीं ज़ख़्म-ए-ज़िगर को बेइंतहा ।

उर में कोलाहल सन्नाटा फैली फ़िज़ा
खुशी कुहराम मचा बैठी हड़ताल पर
बेसबब इन्तज़ार का शामियाना लगा
रचातीं अश्रुओं से हैं स्वयंवर रात भर ।

आखिर कबतक नज़रबंद दिल में रहें
रतनारी आँखों में घटा बनी घिरतीं रहें।
छुपाये रखा जिसे दश्त की निग़ाहों से
शोर बरपा गयीं उमड़ बरसी आँखों से ।

सर्वाधिकार सुरक्षित
                   शैल सिंह

शनिवार, 23 नवंबर 2019

ग़ज़ल '' मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब ''

      मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब


वो मेरे दिल की धड़कन हैं
मैं उनके दिलो जां की धड़कन हूँ
अगर आँखों में नहीं आतीं मेरे चैन की नींदें
तो उनके भी ख़्यालों की मैं मीठी-मीठी तड़पन हूँ। 

वो मेरे हर जिक़्रों में हरदम
मैं उनके हर जज़्बातों में हरदम
क़रन वो भोर के मैं उनकी शाम शीतल सी
मैं उनकी दीवानगी में तो वो मेरे ख़्वाबों में हरदम।

जब से दीदार हुआ उनका
हर वक्त ऑंखें बेक़रार रहती हैं
यकीं इतना मुझे ऐसे ही वो भी बेज़ार रहते हैं 
वो मेरे लिए हैं खास मेरी भी उन्हें परवाह रहती है।

दिल की बेबसी का आलम
दिल समझता नैन हैरान रहते हैं
अहसासों को समझने को बिछड़ना जरुरी है  
मिठास दर्दों में भी होती भले हम परेशान रहते हैं।

मोहब्बत एक हसीं है ख़ाब
ग़र ख़ुदा किस्मत से ख़फा न हो 
ज़रा सी ज़िन्दगी में बेहिसाब मेला मुरादों का
हसीं हर क्षण ख़ियाबां सा ग़र मुहब्बत जुदा न हो।

क़रन--किरण , ख़ियाबां--पुष्पवाटिका
सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह 

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

'' पी आँसुओं का सैलाब समन्दर हूँ बन गई ''


क्यों आते हो मेरे ख़्यालों में तुम बार-बार 
दिल के साज़ों का छेड़ जाते हो तार-तार
मेरी वीरानियाँ भी महकतीं सदा फूल सी
क्यों तन्हाईयों से करते यादों का व्यापार ,

रोज दर्द दहकता हुआ  छोड़ कर सीने में
अक़्सर आजमाते हो टूट बिखर जाने को
हो गई दिल्लगी दिल के किस सौदाग़र से
कि चाहतें हुईं मज़बूर तुम्हें भूल जाने को ,

किस कुसूर की सजा में थी बेवफाई तेरी
वफ़ा की दरिया पहल की तूफां लाने की
क्या कसर बाकी रह गयी थी मेरे प्यार में
असाध्य मर्ज़ मिली तुमसे दिल लगाने की ,

तेरे ही दिए दर्दों की कैफ़ियत है ये ग़ज़ल
रियाज़ रोज करूं दर्द छिपा गुनगुनाने की
किन कण्ठों से गुनगुनाऊं जज़्बात सुरों में
भींगा लफ़्ज़ भी उदास आज शायराने की ,

न नफ़रत मुक़म्मल न मिटा पाना याद ही   
करके तेरे बग़ैर जीने की नाकाम कोशिशें
पी आँसुओं का सैलाब समन्दर हूँ बन गई
बेलग़ाम कश्ती में खे रही तमाम ख़्वाहिशें ,

बात करना ना आया तुझसे तेरे अंदाज में
रहता टूटे सपनों के सच होने का इन्तजार 
जो आँखें नज़रअंदाज़ की हैं आज बेतरह   
वही नज़रें कभी ढूँढ़ेंगी मुझे हो के बेक़रार ,

आँखों से उमड़े  दर्द शोर करें ख़ामोशियाँ
सबने जलसों में देखा मुझे बस हँसते हुए
छुप के रोता दिल नैनों में तड़प दीदार की
देखा न किसी ने भी तन्हाई में तड़पते हुए , 

कैफियत--विवरण,हाल

सर्वाधिकार सुरक्षित
शैल सिंह