शनिवार, 26 सितंबर 2015

दिल बड़ा मासूम,नादाँ कैसे धड़कने से रोकें

'' दिल बड़ा मासूम,नादाँ कैसे धड़कने से रोकें ''


सामने रूप का छल-छलाता हो सागर अगर
कैसे  मतवाला कोई  कदम बहकने  से रोके  ,

मृगनयन से टपकता हो ग़र मय का गागर
कैसे पीने वाला कोई चाहत मचलने से रोके ,
  
संग बहारों का पा बहुर जाते बाग़ों के दिन
कैसे भौंरे ,पाँखी ,तितलियाँ चहकने से रोके ,
   
देख रंगत चमन की तो बागवां का भी दिल  
वाग-वाग हो जाता वो कैसे उछलने से रोके ,

प्रकृति भी होती नई नवेली वसन्ती पवन में  
कैसे मयूरी पंख आह्लादित फड़कने से रोके ,

बादल भी होता दीवाना देख मस्ती मेघ की 
कौन बिजलियों को आस्मां तड़कने से रोके ,

देख मौसम का सुहाना मिज़ाज,मंजर भला
कैसे मस्त घटा चाँदनी को सहकने से रोके ,

वो नजरें  भी तो हमपे कुछ ऐसे इनायत हुईं
दिल बड़ा मासूम,नादाँ कैसे धड़कने से रोकें ,

जो जिस्म से रूह तक उतरी मोहब्बत बनी 
कैसे बेज़ार दिल भी खुद को तड़पने से रोके ,

उनके उखड़ी सांसों की मैंने भी देखी है सूरत 
कैसे बज़्म से उठ वे खुद को संभलने से रोके ।